अंबाला। अंबाला से कुश्ती का नाता पांच दशक पुराना है। करीब 50 साल पहले अंबाला में पांच अखाड़े होते थे। इन अखाड़ों में खिलाड़ी दिनरात पसीना बहाते थे। अब कुश्ती अखाड़ों से निकलकर मैट पर पहुंच गई।
कुश्ती की तकनीक बदल चुकी है और कुश्ती पहले के मुकाबले अब तेज हो गई है, क्योंकि पहलवानों को मैट पर फास्ट खेलना होता है। तीन अखाडे़ बंद हो गए हैं। अब मात्र दो ही शेष हैं। इसमें एक अखाड़े ने अपने आप को अपग्रेड कर दिया और 10 साल से खिलाडियों को मैट पर कुश्ती के गुर सीखा रहे हैं। एक अखाड़ा बचा है। इस अखाड़ा के खिलाडी कुश्ती सीख रहे हैं।
इंटरनेशनल पहलवान राधेश्याम का कहना है कि छावनी में 1970 से उनका हनुमान अखाड़ा है। उनके अखाडें के समय से ही चार अखाड़े और हुआ करते थे। इसमें मदन का मंदिर के पास बब्बू पहलवान का अखाड़ा, दयाल अखाड़ा, बसंती माई मंदिर में अखाड़ा, रामबाग रोड स्थित हनुमान अखाड़ा और महावीर अखाड़ा होते थे।
इन अखाडों में सबसे ज्यादा खिलाडी़ आया करते थे। पहले के समय में रविवार को छावनी के गांधी मैदान और रामबाग रोड स्थित दशहरा मैदान में शनिवार को ओपन दंगल हुआ करते थे। इस दंगल में भाग लेने के लिए दूर दूर से खिलाड़ी और उन खिलाडियों को देखने के लिए लोगों की भीड़ आया करती थी। अंबाला में सप्ताह में दो दिन रविवार और सोमवार को मेले जैसा माहौल होता था।
धीरे-धीरे समय बदला ओपन दंगल बंद हो गए। इसके बाद से मदन के मंदिर के पास बब्बू पहलवान का अखाड़ा, दयाल अखाड़ा और बसंती माई मंदिर में अखाड़ा बंद हो गए। लेकिन रामबाग रोड स्थित हनुमान अखाड़ा ने अपने आप को समय रहते अपग्रेड कर लिया और खिलाडियों को मैट पर कुश्ती के गुर सिखाने लगे। मौजूदा समय में हनुमान अखाड़ा के पास 40 के करीब खिलाड़ी हैं।
अंबाला छावनी स्थित हनुमान अखाड़ा में खिलाडियों के साथ इंटरनेशनल पहलवान राधेश्याम।