देवगढ़ बारिया सीट पर भाजपा का डंका
क्षेत्र की देवगढ़ बारिया सीट पर भाजपा का डंका बजता है। भाजपा के खाबड़ बचुभाई ने 2017 में कांग्रेस वाखला भारतसिंह प्रतापभाई को करारी शिकस्त दी थी। इस सीट पर करीब 75 फीसदी आबादी आदिवासियों की है। इनमें भी भील और पटेलिया समाज के आदिवासियों का दबदबा है। यही कारण है कि इस सीट पर भी आदिवासियों का बोलबाला है। इस चुनावों में भाजपा की जीत बहुत ही आसान नजर आ रही है। कांग्रेस और एनसीपी के उम्मीदवार ने एन वक्त पर अपना नामांकन वापस ले लिया। पिछली बार कांग्रेस से चुनाव लड़ चुके वाखला भारतसिंह इस बार आम आदमी पार्टी में शामिल हो गए हैं। वे आप के टिकट में फिर मैदान में हैं। ऐसे में इस बार सीधा मुकाबला आप और भाजपा के बीच हो गया है।
झालोद सीट में पानी की बड़ी समस्या
झालोद सीट पर भाजपा और कांग्रेस की टक्कर देखने को मिल रही है। यह सीट अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित है। इस क्षेत्र में सबसे अधिक अनुसूचित जनजाति की आबादी है। यह सीट कांग्रेस का गढ़ रही है। 1985 से लगातार कांग्रेस यहां से जीत रही है। भाजपा के कई प्रयासों के बाद साल 2002 में इस सीट पर भगवा फहराया। लेकिन 2012 के चुनावों में कांग्रेस के मितेश भाई ने भाजपा प्रत्याशी बड़े अंतर से हरा दिया। जबकि 2017 में कटारा भावेश भाई ने चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। इस बार कांग्रेस की तरफ से मितेश भाई फिर मैदान में हैं। जबकि भाजपा की ओर से महेश भाई भूरिया मैदान में हैं। झालोद में पिछले विधानसभा चुनाव के बाद से अलग भीलिस्तान की मांग की जा रही है। झालोद के सीमावर्ती क्षेत्रों जैसे गराडू गांव में पानी की समस्या को लेकर लगातार आवाज उठती रही है। भीलिस्तान की मांग मुख्य रूप से बीटीपी यानी इंडियन ट्राइबल पार्टी कर रही है।
लिमखेडा भाजपा का गढ़
लिमखेडा विधानसभा सीट भाजपा का गढ़ है। यहां से भाजपा ने शौलेश भामौर को पार्टी ने मैदान में उतारा है। वे दूसरी बार चुनावी मैदान में है। जबकि कांग्रेस ने रमेश गोंदिया को टिकट दिया है। 2017 में भाजपा के शौलेश भामौर चुनाव जीते थे। उन्होंने कांग्रेस के तडवी महेश भाई को 19314 वोटों से हराया था। इस सीट पर इससे पहले भाजपा के विधायक थे। 1990 में जनता दल, 1995 में भाजपा, 1998 में कांग्रेस, 2002 में भाजपा, 2007 में कांग्रेस के उम्मीदवार यहां से जीते। 2012 में भी यहां भाजपा को जीत हासिल हुई थी।
2008 में परिसीमन के बाद अस्तित्व में आई फतेपुरा सीट
दाहोद जिले की फतेपुरा विधानसभा सीट अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवारों के लिए आरक्षित है। यह सीट भाजपा का गढ़ कही जाती है। यह सीट साल 2008 में परिसीमन के बाद अस्तित्व में आई। 2017 के चुनाव में जिले की फतेपुरा सीट पर भाजपा और कांग्रेस के बीच मुकाबला देखने को मिला था। इस सीट पर अब तक सिर्फ दो विधानसभा चुनाव हुए हैं। दोनों ही बार भाजपा को जीत मिली है। रमेश कटारा जिले की फतेपुरा सीट से दूसरी बार चुने गए युवा विधायक हैं। इस बार भी रमेश कटारा मैदान में है। उनके सामने कांग्रेस के रघु मछार मैदार में उतरे थे। पिछली बार उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। टिकट नहीं मिलने से नाराज गोविंद भाई ने कांग्रेस आप का दामन थाम लिया। ऐसे में कांग्रेस प्रत्याशी के नुकसान की संभावना बढ़ गई है, जबकि भाजपा की राह आसान हो गई है।