-डीडीयू में गिरिश रस्तोगी की स्मृति में व्याख्यान और सम्मान समारोह का आयोजन
- सूर्य मोहन कुलश्रेष्ठ व सतीश चंद्र श्रीवास्तव को हुए सम्मानित
- रंगमंच व्यक्तित्व के बहुआयामी विकास के लिए अति आवश्यक : कुलपति
संवाद न्यूज एजेंसी
गोरखपुर। रंगमंच प्राचीन काल से हमारे जनजीवन का अंग रहा है। मानवीय संवेदना और अनुभूति को रचनात्मक रूप देकर सामाजिक उत्पाद बनाना रंगमंच की विशेषता है। युवा रंगमंच के लिए आशा के केंद्र हैं और उन पर ही रंगमंच को बढ़ाने का दायित्व है। युवा होना कोई आयु की अवस्था नहीं है बल्कि यह मानसिकता है। यह बातें भारतेन्दु नाटक अकादमी के पूर्व निदेशक सूर्य मोहन कुलश्रेष्ठ ने कही।
वे मंगलवार को दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के संवाद भवन में हिंदी विभाग और रूपांतर नाट्य मंच की ओर गिरिश रस्तोगी की स्मृति में आयोजित व्याख्यान एवं सम्मान समारोह को संबोधित कर रहे थे।
विषय प्रवर्तक प्रो. अनिल कुमार राय ने कहा कि गिरिश रस्तोगी ने इस परिक्षेत्र में विपरीत परिस्थितियों में रूपांतर नाट्य मंच की स्थापना की और युवाओं विशेषकर लड़कियों को रंगमंच से जोड़ा। उन्होंने नाटकों का मंचन के साथ अन्य विधाओं की कृतियों का नाट्य रूपांतरण भी किया। हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रो. दीपक प्रकाश त्यागी ने भी रूपांतर की गतिविधियों पर प्रकाश डाला।
अध्यक्षता करते हुए विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. पूनम टंडन ने कहा कि रंगमंच हमारे व्यक्तित्व के बहुआयामी विकास के लिए अति आवश्यक है। मेरा प्रयास होगा कि गोरखपुर विश्वविद्यालय में छात्र-छात्राओं को इस क्षेत्र में अवसर प्राप्त हों। कुलपति ने रूपांतर नाट्य मंच द्वारा रंगकर्मी सूर्य मोहन कुलश्रेष्ठ और रुपान्तर के रंगकर्मी सतीश चंद्र श्रीवास्तव को सम्मानित किया।
रुपांतर नाट्य मंच की अध्यक्ष डॉ. अमृता जयपुरियार ने संस्थान की गतिविधियों का परिचय दिया। धन्यवाद ज्ञापन सचिव निशिकांत पांडेय और संचालन डॉ. आनंद पांडेय ने किया।
इस अवसर पर कला संकाय के डीन सुषमा पांडेय, प्रो. राजेश कुमार मल्ल, डॉ. रामनरेश राम, डॉ. संदीप कुमार यादव, सुनील कुमार, नरेंद्र कुमार, अपर्णा पांडेय, प्रियंका नायक सहित वरिष्ठ रंगकर्मी और छात्र-छात्राएं उपस्थित रहें।