हिन्दी पत्रकारिता दिवस पर बोले साहित्यकार, बदल गए हैं पत्रकारिता के मायने, कुछ ही लोगों के बूते बचे हैं मूल्य
अमर उजाला ब्यूरो
गोरखपुर। किसी खंडहर में कुछ दिये हैं, इन्हीं से काम चलाओ... बड़ा अंधेरा है। गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के पूर्व अध्यक्ष डॉ केसी लाल कहते हैं कि मशहूर शायर व साहित्यकार फिराक गोरखपुरी का यह शेर आज की पत्रकारिता पर सटीक बैठता है।
पत्रकारिता दिवस पर अपनी शुभकामनाएं देते हुए उन्होंने कहा कि पहले और अब की पत्रकारिता में बहुत अंतर आ गया है। मूल्य बदल गए हैं। पहले की पत्रकारिता ने स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान एक अलग व्यक्तित्व, पहचान बनाई थी। संघर्ष के बड़े मूल्य तय किए थे। आज की पत्रकारिता, स्तरहीन हो गई है। पहले पत्रकारिता का आदर्श बचाने के लिए संघर्ष होता था, अब इसकी चिंता लोगों में खत्म होती जा रही है।
कहा कि लोग निष्पक्ष पत्रकारिता का दावा करते हैं मगर पत्रकारिता की भाषा देखिए। ये भाषा आम जनता में नई चेतना न जागृत कर राजनीतिक हो गई है। आज की पत्रकारिता में स्वाभिमान, निडरता का स्वरूप कम हो गया है। मगर इस सारे माहौल के बीच अभी भी कुछ पत्रकार, निर्भीक पत्रकारिता कर रहे हैं लेकिन उन्हें उसका मूल्य भी चुकाना पड़ रहा है। इस निडरता के लिए इनकी सराहना करनी चाहिए। ये ही कुछ लोग पत्रकारिता को जिंदा रखे हैं।
साहित्यकार प्रो रामदेव शुक्ल कहते हैं कि पहले अखबार में एक विज्ञापन निकलता था जिसका मजमून कुछ यूं था कि जो बिना खाए-पीए रह सकते हैं। किसी से किसी प्रकार की इच्छा भय न रखें वह ही पत्रकार बनने के लिए आ सकते हैं। आज की पत्रकारिता की तस्वीर इसके बिल्कुल उलट है। हर अखबार और चैनल कहीं न कहीं से प्रभावित हैं। निष्पक्षता का बड़ा संकट है। पत्रकारिता के इस दौर को देखते हुए इसके भविष्य के बारे में कुछ भी कहना कठिन है।
इसी तरह साहित्यकार देवेंद्र आर्य पत्रकारिता को अब सेवा नहीं पेशा बता रहे हैं। उनका कहना है कि जैसे जनता की सेवा के नाम पर सियासत एक पेशा है और सारे पेशों ने सियासत के पेशे के आगे हथियार डाल दिए हैं।
अब अख़बार की प्रबंधकीय टैग लाइन जो भी और जितनी भी जनता की पक्षधर और आकर्षक हो, उसका एक मात्र उद्देश्य सर्कुलेशन बढ़ाना और व्यवस्था का लाभ पहुंचाना ही है। हालांकि भला हो उन थोड़े से पत्रकारों का जिनमें अभी भी देश और समाज के प्रति कर्तव्य भावना बची है। ऐसे ही पत्रकारों को पत्रकारिता दिवस की शुभकामनाएं।
सतविंदर कौर का कहना है कि हमारी आजादी प्रेस की आजादी से सीधी जुड़ी हुई होती है। जनता की आजादी को सीमित करने के लिए हमेशा प्रेस पर प्रहार किया जाता रहा है, लेकिन पत्रकारिता हर बार यह साबित करने में सफल रही है कि कलम की ताकत तलवार से कई गुना ज्यादा होती है।