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जीव जब भवचक्र में फंसता है तब भगवान संत के रूप में उसे बाहर निकालता है: पराशर

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जीव जब भवचक्र में फंसता है तब भगवान संत के रूप में उसे बाहर निकालता है: पराशर
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भारत उत्सवों का देश, यहां जब उत्सव मनाया जाता देवताओं को होती है जलन
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गोरखपुर। गोरखनाथ मंदिर में चल रही श्रीमद्भागवत कथा में व्यास डॉ. श्यामसुन्दर पराशर ने कहा कि जीव जब भव चक्र में भटक जाता है तब भगवान ही संत व सद् गुरु देव के रूप में आकर भव चक्र पार लगाते हैं। जीव पुरंजन के रूप में होता है किंंतु सदगुरु के उपदेश से अपना स्वरूप पहचानता है।
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बृहस्पतिवार को गोरखनाथ मंदिर में मूर्ति प्राण प्रतिष्ठा के मौके पर आयोजित सात दिवसीय कथा के दौरान कथा व्यास डॉ. पराशर ने कहा कि भारत वर्ष में तीन भरत हुए हैं। एक ज्ञानयोग ,दूसरे कर्मयोग और तीसरे भक्ति योग की साक्षात मूर्ति हैं। भारत उत्सवों का देश है, जब हम उत्सव मनाते हैं तो देवताओं को जलन होती है कि हमें यह सौभाग्य क्यों नहीं मिला। साथ ही उन्होंने कहा कि भारत ही ऐसा देश है जहां साधु, संत,महंत, जगतगुरु आदि का दर्शन करने को मिलता है। जीवन में जब भगवान कि भक्ति रूपी सूर्य का उदय होता है तब जीवन के सभी अंधकार दूर हो जाते हैं। अजामिल की कथा सुनाते हुए कथा व्यास ने कहा कि वस्तु की शक्ति ज्ञान की अपेक्षा नहीं करती, उस वस्तु का ज्ञान हो या न हो। जैसे बिजली के तार में करंट धोखे से भी छूने पर जान ले लेता है वैसे हीं भगवान के नाम की शक्ति भी ज्ञान की अपेक्षा नहीं करती। धोखे से भी मरते समय यदि भगवान का नाम ले लिया, तो उसे बैकुंठ की प्राप्ति होती है। अजामिल ने मरते समय यमदूतों को देखकर भय से अपने बेटे नारायण को बुलाया तो भगवान विष्णु के पार्षद आकर उसे बैकुंठ ले जाते हैं। परमात्मा ने हमें जो सुर दुर्लभ मानव शरीर दिया है, उसके लिए हम यदि उनका नाम न लें, उन्हें धन्यवाद न करें तो हम से बड़ा कृतघ्न कोई नहीं।
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