तमाम शिकायतों के बावजूद नहीं रुक रहा अवैध अस्पताल का खेल
अमर उजाला ब्यूरो
गोरखपुर। अवैध अस्पताल संचालकों पर शासन-प्रशासन का कोई खौफ नहीं है। आलम यह है कि गांव-देहात के किसी कोने में नहीं, बल्कि बीच शहर में ही दूसरे डॉक्टरों के नाम पर अस्पताल संचालित हो रहे हैं। इन अस्पतालों में इलाज में सहयोग करने वाले मेडिकल स्टॉफ का भी चिकित्सा शिक्षा से कोई वास्ता नहीं है। कम पढ़े-लिखे नौजवान किसी अस्पताल में कुछ दिन वार्ड बॉय की नौकरी करने के बाद ऐसे अवैध अस्पतालों में फार्मासिस्ट के तौर पर काम करने लगते हैं। इनका भांडा तभी फूटता है जब किसी मरीज की इलाज के दौरान मौत हो जाती है। आनन-फानन इन्हें सील कर मामले को दबा दिया जाता है।
जिले में अवैध अस्पतालों का धंधा लंबे समय से फल फूल रहा है। कई बार इस मुद्दे पर प्रशासन ने सख्ती का दावा किया है। बीते साल जुलाई में हुई कई घटनाओं के बाद कमिश्नर ने सख्ती दिखाई तो ऐसे अवैध अस्पतालों पर कार्रवाई का दावा किया गया। लेकिन, कुछ समय बाद ही फिर कोई नाम बदलकर तो कोई जगह बदलकर चलने लगा।
शुक्रवार की रात शहर में जिस अस्पताल में छापा मारा गया, वहां के हालात भी पहले जैसे ही मिले। मतलब एक डॉक्टर के नाम पर पंजीकरण कर अस्पताल तो चलाया जा रहा था, लेकिन वहां उस डॉक्टर का पता ही नहीं था।
केस 1
कैंपियरगंज में एक अस्पताल में भर्ती प्रसूता की हालत बिगड़ी तो उसे चिलुआताल के एक नर्सिंग होम भेजा गया। वहां उसकी मौत के बाद जब हंगामा हुआ तो पता लगा कि दोनों ही नर्सिंग होम अवैध थे। दोनों को सील किया गया, लेकिन वे दोनों किसकी शह पर और कैसे संचालित हो रहे थे, इसका राज दफन हो गया।
केस 2
कुनराघाट क्षेत्र में एक नर्सिंग होम में पांच साल की बच्ची की इलाज के दौरान मौत हो गई। बच्ची की मां महिला कांस्टेबल है। उसने केस दर्ज कराया तब अगले दिन अस्पताल सील हुआ। पता लगा कि जो व्यक्ति खुद को डॉक्टर बताकर इलाज कर रहा था, उस पर पहले भी केस दर्ज हुआ था। यह अस्पताल भी दूसरे के नाम पर पंजीकृत था। यहां भी अस्पताल संचालन किसके इशारे पर हो रहा था, यह पता नहीं लगा।
केस 3
ट्रांसपोर्ट नगर में अमन हॉस्पिटल के नाम से संचालित अस्पताल को एक जांच के आधार पर सील किया गया था। वहां किसी ने खुद को डॉक्टर बताते हुए नवजात का इलाज कर दिया, जिससे उसकी हालत बिगड़ गई थी। घरवालों ने हंगामा किया तो इस अस्पताल की जांच हुई। अस्पताल का लाइसेंस रद्द कर दिया गया। इसके बाद संचालक ने बगल में दूसरा अस्पताल खोल लिया था। मोहल्ले के लोगों ने शिकायत की, तब जाकर इसे दोबारा सील किया गया।
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लगातार हो रही कार्रवाई : सीएमओ
अवैध रूप से अस्पताल संचालन की जब भी शिकायत मिलती है, तत्काल जांच कर कार्रवाई की जाती है। अस्पतालों को सील कराने के लिए अब केस भी दर्ज कराए जा रहे हैं। लोगों को लगातार इस बात के लिए जागरूक किया जा रहा है कि जिस अस्पताल में अपने परिजन का इलाज कराएं, उसके डॉक्टर के बारे में भी पता करें।
- डॉ. आशुतोष कुमार दूबे, सीएमओ