गोरखपुर। अक्सर ऑफिस से छुट्टी के लिए लोग किसी एमबीबीएस डॉक्टर के पर्चे पर दवा लिखवाकर छुट्टी ले लेते हैं, लेकिन अब ऐसा करना डॉक्टरों के लिए मुसीबत बन सकता है। क्योंकि इंडोर में भर्ती मरीज का डॉटा तीन साल तक सुरक्षित रखना है। अगर मरीज या कोई विधिक संस्था रिकार्ड मांगती है तो उसे पांच दिन में उपलब्ध कराना डॉक्टर की जिम्मेदारी होगी। यदि डॉक्टर पर लापरवाही का आरोप लगता है और जांच में उसकी पुष्टि होती है तो उनका लाइसेंस भी तीन से लेकर पांच साल तक के लिए निलंबित हो सकती है।
डॉक्टरों के लिए नेशनल मेडिकल कमीशन (एनएमसी) ने नियमावली जारी की है। इस नियमावली में डॉक्टरों के पंजीकरण, चिकित्सा व्यवसाय, मरीज के प्रति जिम्मेदारी, दवा विक्रय की स्थिति समेत प्रत्येक बिंदु पर विस्तार से चर्चा है। इसमें स्पष्ट किया गया है कि निजी प्रैक्टिस में लगे डॉक्टर मरीज के अंतिम विजिट से अगले तीन साल तक एनएमसी की तरफ से निर्धारित मानक के अनुरूप उसका रिकार्ड सुरक्षित रखेंगे। यह भी अपेक्षा है कि रिकार्ड को कंप्यूटराइज करा लिया जाए, जिससे वह सुरक्षित रहे और मांगे जाने पर पांच दिन के अंदर उपलब्ध कराया जा सके। इसके अलावा कुछ मामलों में चिकित्सक के प्रमाणपत्र, रिपोर्ट व इसी प्रकार के अन्य कागजात कानूनी रूप से जरूरी होते हैं। ऐसे अभिलेख के लिए अलग से एक रजिस्टर तैयार किया जाएगा।
नियमों का उल्लंघन व्यावसायिक कदाचार होगा
एनएमसी की गाइडलाइन में कहा गया है कि मेडिकल प्रैक्टिस से संबंधित अधिनियमों के उल्लंघन को कदाचार माना जाएगा। एनएमसी और राज्य चिकित्सा परिषद ऐसे मामलों में सुनवाई कर निर्णय कर सकती है। पंजीकृत डॉक्टर ऐसी किसी गतिविधि में शामिल नहीं हो सकते जो इन नियमों का उल्लंघन करती हो। डॉक्टरों को ऐसा कोई रोजगार या अनुबंध नहीं करना चाहिए जो इन नियमों का उल्लंघन करती हो। भ्रष्टाचार वाले संज्ञेय अपराध के मामले में आरोप सिद्ध होने पर प्रैक्टिस करने के लाइसेंस का निलंबन हो सकता है।
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कोट
एनएमसी की गाइडलाइन तत्काल प्रभाव से लागू हो चुकी हैं। सरकारी अस्पतालों में पहले से ही एक साल का रिकार्ड रखने का नियम है। प्राइवेट अस्पताल भी इंडोर भर्ती मरीजों का विवरण रखते हैं। नए नियमों का कड़ाई से पालन कराया जाएगा। फर्जी मेडिकल सर्टिफिकेट बनाना गैर पेेशेवर व भ्रष्ट आचरण की श्रेणी में आता है। ऐसे मामलों पर सख्ती से रोक लगाई जाएगी।
-डॉ. आशुतोष दूबे, सीएमओ