सीमेंट की बनी सरस्वती माता की मूर्ति को अंतिम रूप देते मूर्तिकार रंजीत मद्धेशिया
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रुस्तमपुर में महाकाल समिति की ओर से स्थापित मां दुर्गा के 108 चेहरे और 121 हाथ वाली माता की प्रतिमा सबको आकर्षित कर रही है। इसको बनाने वाले गुलरिहा के मूर्तिकार रंजीत मद्धेशिया भी चर्चा में हैं। मुफलिसी में जीवन काटने वाले मूर्तिकार पर अब कृपा भी बरस रही है। वे बताते हैं कि बरसों टेंट में रहने वाला उनका परिवार अब अच्छे मकानों में रह रहा है।
बचपन में ही पिता की मौत हो गई तो भाई ने सहारा देकर पढ़ाया। पढ़ाई के साथ ही उन्होंने मूर्तिकला में हाथ आजमानी शुरू की। आज वह इस मुकाम पर हैं कि मां दुर्गा की प्रतिमा बनाकर नेपाल तक भेज रहे हैं। सीमेंट की बनी अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएं व टेराकोटा के उत्पाद भी बना रहे हैं।
मूर्तिकार रंजीत मद्धेशिया सात भाइयों में छठवें नंबर पर हैं। वह बताते हैं कि चर्चा का विषय बनी माता की प्रतिमा को उन्होंने सोशल मीडिया पर देखा था। इससे प्रेरित होकर उन्होंने इस प्रतिमा को बनाने का संकल्प लिया। पिछले साल 100 हाथ व एक सिर वाली माता की प्रतिमा बनाई थी। इसके बाद 108 चेहरे व 121 हाथों वाली माता की प्रतिमा बनाई है।
रंजीत बताते हैं कि उनके पिता हलवाई का काम करते थे। 28 साल पहले उनका निधन हो गया। पिता की मौत के समय वह कक्षा दो में पढ़ते थे। इसके बाद बड़े भाई विनोद ने पढ़ाया-लिखाया। मूर्ति बनाने का कार्य गुलरिहा में प्लास्टिक के टेंट के घर पर ही शुरू किया। सात भाइयों को भी रोजगार मिला। इसके बाद भी लगभग 10 साल तक गरीबी ने पीछा नहीं छोड़ा। प्लास्टिक के टेंट के घर में ही गुजर-बसर हुई। फिर पक्का मकान सभी भाइयों का बना।
उन्होंने बताया कि वह सालभर में 300 प्रतिमाएं बनाते हैं। टेराकोटा के उत्पाद भी बनाते हैं। अन्य राज्यों में सीमेंट की बनी अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएं भी सप्लाई करते हैं। इसके लिए वह कई जगहों पर पुरस्कृत भी हो चुके हैं।