होली के बदलाव की कहानी पिचकारी के बिना अधूरी है। साठ के दशक में बांस से बनी पिचकारी से होली का रंग बरसता था। बाद में उसकी जगह पीतल और फिर स्टील की पिचकारी आ गई। त्योहार पर बाजार का रंग गाढ़ा हुआ तो प्लास्टिक की अलग-अलग डिजाइन में पिचकारियां बिकने लगीं।
इस साल तो इससे भी दो कदम आगे बढ़कर रंग-गुलाल भरे पटाखे आ गए। शहर में चार पीढि़यों से पिचकारी की दुकान चलाने वाले बाबूराम कहते हैं कि लोग कैसे और किससे रंग खेलेंगे, अब यह भी बाजार तय करने लगा है।
बेलीपार क्षेत्र के भस्मा गांव के रहने वाले
इतिहासकार डॉ. कृष्ण कुमार पांडेय बताते हैं कि पहले कम से कम 15 दिन पहले ही होली का माहौल बन जाता था। बाजार दूर-दूर और साप्ताहिक हुआ करते थे। ऐसे में लोग त्योहार को यादगार बनाने के लिए नए-नए उपाय करते थे।
ग्रामीण क्षेत्र में लोग बांस की पिचकारी बनाते थे, जिसके लिए बांस की गांठ, लकड़ी और कपड़े का प्रयोग होता था।
आजादी के एक दशक बाद पीतल की पिचकारी का दौर आया। हालांकि, तब यह केवल आर्थिक रूप से संपन्न लोगों के ही पास होती थी। पीतल की पिचकारी भी अलग-अलग प्रकार की बनने लगी।
शहर के पांडेय हाता में बाबूलाल की पिचकारी की थोक दुकान है। चार पीढि़यों से चल रही इस दुकान को बाबूराम चार दशक से संचालित कर रहे हैं। होली और पिचकारी की चर्चा छिड़ते ही बाबूलाल यादों पर जोर डालते हुए कहते हैं कि हमने जब दुकान पर बैठना शुरू किया तो उस वक्त पिचकारी की कीमत दो रुपये हुआ करती थी। तब नया-नया प्लास्टिक का चलन शुरू हुआ था।
स्प्रिंग वाली इस पिचकारी की बिक्री खूब होती थी। इसी दौर में स्टील की फव्वारे वाली पिचकारी आई, जो बाद में पीतल की पिचकारी का विकल्प बन गई। हालांकि, प्लास्टिक के चलन ने इसमें भी परिवर्तन किया और बाद में स्टील जैसी पिचकारी प्लास्टिक की मिलने लगी।
साहबगंज में पिचकारी बेचने वाले सुल्तान बताते हैं कि हर साल तकनीक बदल जा रही है। पहले लोग एक बार पिचकारी खरीदते थे और कई वर्ष तक उससे होली खेलते थे। लेकिन अब कंपनियां हर साल नए डिजाइन को लांच करती हैं। बच्चे भी होली के बाद पिचकारी फेंक देते हैं।
ट्रक पर भर लेते थे रंग भरा ड्रम
आर्यनगर के रहने वाले सेवानिवृत रेलकर्मी वंशीधर श्रीवास्तव बताते हैं कि पुराने जमाने में आर्यनगर, घंटाघर और धर्मशाला बाजार में लोग रंग खरीदने आते थे। जो लोग खरीदारी करने आते थे वे रंगों में नहाकर ही वापस आते थे।
इसकी वजह यह थी कि युवाओं की टोली छतों से रंग फेंक दिया करती थी। बच्चे और युवा छतों पर टब या बाल्टी में रंग भरकर रखते थे। सड़क से गुजर रहे अनजान लोगों पर भी ऊपर से रंगा बरस जाते थे। उस वक्त सिंधी समाज के लोगों के ही ज्यादा ईंट भट्ठे थे। वे ट्रकों पर ड्रम में रंग भरकर निकलते थे और जो भी रास्ते में मिलता था उसे रंग डालते जाते थे। हर कोई होली के उल्लास में मगन होता था।