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आस्था से खिलवाड़: न तो खाली हुआ पोखरा, न हुई साफ सफाई

Fri, 27 Oct 2023 06:56 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, गोरखपुर।
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गोरखपुर में प्रतिमा विसर्जन। - फोटो : अमर उजाला।
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गोरखपुर के राजघाट में राप्ती नदी किनारे प्रतिमा विसर्जन के लिए बने पोखरे मलबों से पटे पड़े हैं। नगर निगम ने सफाई की सुध ही नहीं ली। बृहस्पतिवार को न तो पोखरों को साफ किया गया और न ही साफ-सफाई कराई गई। अलबत्ता, प्रतिमाओं का अवशेष बटोरने की होड़ लोगों में मची रही। लोग सामान उठाकर ले जाते नजर आए। पूजन सहित अन्य सामग्री को पैरों तले रौंदते हुए धमाचौकड़ी मचाते रहे। अब पोखरे के पानी से दुर्गंध आने लगी है।
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शहर में नौ दिनों की पूजा के बाद दुर्गा प्रतिमाओं का विसर्जन मंगलवार से शुरू हुआ है। प्रतिमाओं के विसर्जन के लिए राजघाट में राप्ती नदी के किनारे नगर निगम की ओर से तीन पोखरे बनाए गए हैं। डोमिनगढ़, चिलुआताल सहित अन्य जगहों पर ऐसा ही इंतजाम किया गया। बुधवार की देर रात इन जगहों पर अधिकांश प्रतिमाओं का विसर्जन कराया गया। बृहस्पतिवार को भी यह सिलसिला चलता रहा। दोपहर तक आधा दर्जन से अधिक प्रतिमाओं का विसर्जन कराया गया। लेकिन पोखरों की साफ सफाई पर ध्यान नहीं दिया गया। नदी पर विसर्जन के लिए बने पोखरे के साथ रामघाट और गुरु गोरखनाथ घाट पर गंदगी नजर आई। लोगों ने छोटी प्रतिमाओं और अन्य सामग्री का विसर्जन नदी में कर दिया था। इससे घाटों पर गंदगी फैली है। वहां पूजापाठ कराने आए लोगों ने कहा कि इसकी सफाई का पूरा इंतजाम किया जाना चाहिए। नवरात्र में नौ दिनों तक दुर्गा प्रतिमाओं को पंडाल में स्थापित करके लोगों ने खूब पूजापाठ किया। लेकिन विसर्जन में आस्था खत्म हो गई। प्रतिमाओं को जैसे तैसे प्रवाहित करके लोग चले गए। पूजापाठ की सामग्री भी इधर उधर फेंक दी।


किसी ने चलाई आरी तो किसी ने जैसे तैसे निकला अवशेष

प्रतिमाओं को विसर्जित किए जाने के बाद नगर निगम की जेसीबी से बुधवार को सफाई कराई जा रही थी। लेकिन बृहस्पतिवार को कम विसर्जन होने से इस पर विशेष ध्यान नहीं दिया गया। इससे प्रतिमाओं का बांस का ढांचा, लकड़ी सहित अन्य सामान पोखरों में पड़ा रहा। बृहस्पतिवार की दोपहर 01.47 बजे यहां पोखरों से सामान निकालने की होड़ मची रही। दो नंबर पोखरे में एक युवक और एक 12 साल का बालक ढांचा निकालने के लिए उसे आरी से काटकर खींचते नजर आए। यह क्यों निकाल रहे हैं, यह पूछने पर पहले तो नाराजगी जताई। उनके अलावा अन्य लोगों ने जैसे तैसे अवशेष निकाला।
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कोई बनाएगा झोपड़ी तो किसी के काम आएगी जलौनी

प्रतिमाओं के ढांचे में लगे बांस और पटरी को निकाल रहे लोग अलग अलग उपयोग करेंगे। कुछ लोग इसे झोपड़ी बनाने में इस्तेमाल करेंगे तो कोई इसे जलौनी बनाएगा। अमरुतानी से आई विंद्रावती ने कहा कि वह बंधे के किनारे झोपड़ी बनाने के लिए लकड़ी निकाल रही हैं। यहां मिली आशा और मेवाती ने कहा कि खेतों में बाड़ बनाने में इसका प्रयोग करते हैं। कुछ लोग जाड़े के दिनों में अलाव जलाने और भोजन पकाने के लिए जलौनी में इस्तेमाल करते हैं। महिलाओं ने बताया तो कपड़े मिले हैं। उनको परदा बनाने, सामानों को ढकने और बिस्तर सिलने में काम लाया जाता है।

बच्चे तलाश रहे रुपये, पानी से लेकर किनारों तक बिखरा सामान

पोखरों में प्रतिमाओं के विसर्जन के बाद पूजन सामग्री, पुस्तकें, कपड़े, छोटी मूर्तियों सहित अन्य सामग्री पोखरे के पानी से लेकर नदी के किनारे तक फैला हुआ है। इनकी सफाई को लेकर मौजूद कर्मचारी भी गंभीर नहीं नजर आए। इस वजह से पानी से बदबू उठने लगी है। कचरे में बदल चुके पूजापाठ के सामानों को कुचलते हुए लोग अपने जरूरत का सामान तलाशते नजर आए। बच्चे हर पोटली को खोलकर उसमें रुपये खोजते मिले।
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