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बाढ़ पीड़िता का दर्द: बाबू! पेट की आग से ज्यादा नहीं है सूरज की तपन

Fri, 10 Sep 2021 01:06 PM IST
vivek shukla उदयभान त्रिपाठी, गोरखपुर।

सार

बाढ़ पीड़ित राजमती हाईवे के किनारे अमरूद बेचकर गुजर-बसर रहीं हैं। बेटा बेरोजगार, बुजुर्ग राजमती के लिए दो वक्त की रोटी भी मुश्किल।
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अमरूद बेच कर गुजर-बसर करने को मजबूर हैं बुजुर्ग राजमती। - फोटो : अमर उजाला।
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उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले में सभी नदियों का जलस्तर कम होने के साथ ही कटान का खतरा भी गहरा गया है। हर तरफ लोगों की दुश्वारियां नजर आ रही है। ऐसे में गोरखपुर-वाराणसी हाईवे के किनारे अमरूद बेच रही, 65 साल की एक महिला से वहां से गुजर रहे युवक ने पूछा कि आप इस उम्र और इतनी तीखी धूप में आप अमरूद क्यों बेच रहीं हैं। इस सवाल के जवाब में उस वृद्धा के मुंह से निकले वाक्य में पेट की आग और सूरज की तपन से कहीं ज्यादा इस उम्र में मजबूरी की झुलसन थी। उन्होंने कहा कि 'बाबू! पेट की आग से ज्यादा नहीं है, सूरज की तपन'। बता दें कि उन्हें इस उम्र में मजबूरी की इस आग में बाढ़ के पानी ने झोंका है।
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बता दें कि गोरखपुर-वाराणसी राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे दोपहर में करीब दो बजे जब तपन 40 डिग्री महसूस हो रही थी, यह बुजुर्ग महिला अकेले टोकरी रखकर अमरूद बेच रही थी। यह वृद्धा नौसड़ के घोला मोहल्ले की राजमती हैं। राप्ती की बाढ़ का पानी राजमती के दरवाजे पर चढ़ गया है। एक सप्ताह तक घर से नहीं निकलने के चलते परिवार के सामने फांकाकशी की नौबत आ गई। कोटेदार के यहां से अनाज तो मिल गया, लेकिन उसे पकाने के लिए रसोई गैस सिलिंडर से लेकर तेल, मसाला तक का इंतजाम कैसे हो? लिहाजा, राजमती ने पानी और धूप से मुकाबला करते हुए, दो पैसे कमाने की सोची।

वह गांव के एक व्यक्ति के यहां गईं और उनके बागीचे से अमरूद ले जाकर सड़क पर बेचने की बात की। बागवान तैयार हुआ, लेकिन राजमती के पास अमरूद खरीदने के लिए पैसे नहीं थे। उन्होंने उधार देने की विनती की तो इस शर्त पर बात बनी कि मुनाफे में आधा-आधा हिस्सा रहेगा। उम्र का तकाजा है कि वह एक बार में अधिकतम-पांच-सात किलो अमरूद ही ला पातीं हैं।
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रास्ते पर पानी भरा है, लिहाजा वही बेचकर गुजर-बसर करना है। सुबह से शाम तक धूप में झुलसने के बाद, बागवान का हिस्सा निकालकर राजमती के हाथ 25-30 रुपये ही आते हैं। बाढ़ तो बहाना है, राजमती का गुरबत से रिश्ता पुराना है। बतातीं हैं कि पहले उनका मकान गांव में था। कुल चार बिस्वा जमीन थी, जो पति के इलाज में बिक गई। बचे पैसों से गांव के बाहर दूसरी जगह जमीन ली गई। भला हो सरकार का, प्रधानमंत्री आवास के लिए मिले रुपयों से इस जमीन पर घर बन रहा है। बेटा नंदलाल रोजगार की तलाश में भटक रहा है। बिटिया की उम्र भी शादी लायक हो चुकी है। उसके हाथ पीले करने की चिंता ने उम्र को और बढ़ा दिया है।
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