गोरखपुर। नजूल अध्यादेश-2014 को लेकर शहर में इन दिनों हलचल मची है। सरकारी जमीनों को पट्टे पर लेने वाले नए अध्यादेश के आने के इंतजार में हैं तो वहीं नजूल और सीलिंग के साथ चर्च सोसायटी की जमीनों को गलत तरीके से बेचने के मामले भी सामने आ रहे हैं। इसी शहर में एक लेखपाल ने कमिश्नर का आवास और बेतियाहाता में एक पोखरी बेच दी थी। इसके बाद शासन-प्रशासन में हड़कंप मच गया था। हालांकि, इस मामले में लेखपाल को जेल की हवा खानी पड़ी थी।
मामला 1985-86 का है। बेतियाहाता हलका के लेखपाल दिग्विजय मिश्र उर्फ मारुति मिश्रा थे। सूर्यकुंंड निवासी मारुति मिश्र हालांकि अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनके कारनामों के किस्से अब एक बार फिर चर्चा में हैं। शहर में बेतिया इस्टेट की करीब 51 एकड़ जमीन थी। इसमें बेतियाहाता मोहल्ले में पांच एकड़ से ज्यादा जमीन पर कमिश्नर का आवास और हाता था। इस जमीन को लेखपाल ने फर्जी दस्तावेजों के सहारे बेच दिया था।
मामले की जानकारी हुई तो शासन-प्रशासन में हड़कंप मच गया। जांच शुरू कराई गई। मामला सही पाया गया तो लेखपाल के खिलाफ केस दर्ज कर निलंबित कर दिया गया। इसके बाद लेखपाल, हाईकोर्ट से स्टे लेकर आ गया। बाद में पता चला कि वह भी फर्जी है। इस मामले में उसे जेल भी जाना पड़ा।
वरिष्ठ अधिवक्ता कृष्ण बिहारी दुबे बताते हैं- बेतिया इस्टेट की जमीन ही नहीं, बेतियाहाता में एक पोखरा था, जिसका नाम था तेल गड़हिया। करीब सात एकड़ से ज्यादा जमीन को लेखपाल ने फर्जी दस्तावेज के आधार पर बिकवा दिया था। मारुति मिश्र का नाम बहुत ही चर्चित था।
पहले लेखपाल थे जिन्होंने खरीदी थी मारुति कार...नाम भी पड़ गया मारुति मिश्रा
मारुति मिश्रा के नाम से मशहूर लेखपाल का असली नाम दिग्विजय मिश्र था। 1980 के दशक में उनका बड़ा रुतबा था। कलक्ट्रेट में शायद ही कोई शख्स रहा, जो उन्हें नहीं जानता हो। उनके मारुति नाम से मशहूर होने का किस्सा दिलचस्प है।
वरिष्ठ अधिवक्ता रवि श्रीवास्तव बताते हैं- दिग्विजय प्रशासनिक अमले में पहले ऐसे लेखपाल या कानूनगो थे, जिन्होंने सबसे पहले मारुति कार खरीदी थी। कहा जाता है कि वह लेखपालों के काम से लखनऊ गए थे और वहां उन्होंने कार बुक करा दी थी। उस दौर में भी वह मारुति कार से ही चलते थे, जबकि बहुत सारे लेखपाल को बाइक तक नसीब नहीं थी, साइकिल से ही लोग चलते थे।