प्रतिमाएं श्रेष्ठ हो अहम यह नहीं...दिखावा छोड़ श्रद्धा भाव से करें मां की प्रतिमा विसर्जन
प्राण प्रतिष्ठा से जीवित हो जाती हैं प्रतिमाएं, सोच बदलनी होगी वरना संस्कार विहीन पूजा अर्थहीन
अमर उजाला ब्यूरो
गोरखपुर। देवी-देवताओं की प्रतिमाओं की स्थापना की होड़ सी लग गई है। लेकिन, इस बीच लोग श्रद्धा की जगह दिखावा पर ज्यादा जोर दे रहे हैं। बड़ी प्रतिमाएं, शोरगुल और दिखावा अब आस्था पर भारी पड़ने लगा है। पंडाल में पूजा-पाठ का तो विशेष ख्याल रखा जा रहा है लेकिन, विसर्जन के दौरान श्रद्धा भाव गायब हो जा रहा है। विद्वातजन भी मानते हैं कि सोच बदलनी की जरूरत है वरना इस पूजा-पाठ का कोई अर्थ नहीं है।
लोगों की सोच पर दिखावा हावी इसे बदलने की जरूरत
प्रतिमा को स्थापित करने से लेकर विसर्जन तक पूजा पद्धति तय है। एक दशक पहले तक श्रद्धा पूर्ण विसर्जन का रिवाज हमने देखा है। लेकिन, अब शोरगुल और दिखावा लोगाें की सोच पर हावी है। लोगों के लिए मौज-मस्ती ज्यादा अहम हो गया है। यह सब अज्ञानता के चलते है। सच कहूं, पूजा के रूप में अब तो बहुत सारे जगहों पर मजाक हो रहा है। लोग यह तक नहीं सोचते हैं कि जिस माता की प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा कर पूजते हैं और उसी मां को किस तरह तालाब और पोखरे में फेंक दे रहे हैं। उचित परंपरा के अनुसार विसर्जन करना चाहिए। यह सब देखकर मन खिन्न हो जाता है।
लाल मणि तिवारी, प्रबंधक गीता प्रेस
संस्कार विहीन पूजा-पाठ अर्थहीन
माता की प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा जब करते हैं तो माना जाता है कि प्रतिमा जीवित रूप में विराजमान हो जाती है। हमें प्रतिमा का विसर्जन यानी कि माता की अंतिम विदाई भी विधि-विधान से ही करना चाहिए। जिस तरह माता-पिता को अंतिम विदाई देते हैं उसी प्रकार पूरी श्रद्धा के साथ रस्म को निभाना चाहिए। संस्कार विहीन पूजा-पाठ अर्थहीन होता है। लेकिन, लोग विसर्जन के समय यह सब भूल जा रहे हैं। ऐसे लोगों को सोच बदलनी होगी। अगर यह नहीं कर पाते हैं तो प्रतिमा स्थापित नहीं करनी चाहिए।
रसेंदु फोगला, सह सचिव हनुमान प्रसाद पोद्दार स्मारक समिति
प्रतिमाएं बड़ी नहीं श्रद्धा का बड़ा होना जरूरी
शास्त्रों में जिस तरह से प्रतिमाओं के विसर्जन के बारे में बताया गया है उस विधान से लोग प्रतिमाओं का विसर्जन कर ही नहीं रहे हैं। ज्यादातर लोगों में आस्था नहीं बल्कि दिखावा करने की होड़ लगी हुई है। वह चाहते हैं कि उनकी प्रतिमा श्रेष्ठ हो। जिसका नतीजा है कि अब इतनी बड़ी-बड़ी प्रतिमाएं स्थापित कर देते हैं कि उनका विसर्जन ठीक तरीके से नहीं हो पाता है। जिस प्रतिमा की नौ दिनों तक मां के रूप पूजते हैं उसी मां को जल में डालने के बाद यह तक नहीं देखते कि उनकी प्रतिमा जल में घुली या नहीं। सिर्फ प्रतिमाओं को विसर्जन की जगह फेंककर चले आते हैं। जो बिल्कुल गलत है और आस्था के नाम पर मजाक है। लोगों को इतनी बड़ी ही प्रतिमा स्थापित करनी चाहिए जो आसानी से विसर्जित हो जाए। डॉ. जोखन पांडेय शास्त्री, महामंत्री भारतीय विद्वत समिति