गोरखपुर। घर का कोई सदस्य अगर एक सप्ताह से अधिक समय से गुमसुम रहने लगा हो, खाने-साथ बैठने में अरुचि दिखाए और बात-बात में जीवन से निराशा के भाव प्रकट करे, तो तत्काल सावधान हो जाएं। उसकी काउंसिलिंग कराएं और किसी मनोचिकित्सक से सलाह लें। पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं में इस तरह के लक्षण ढाई गुना अधिक होते हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, यह मानसिक रोग की शुरूआत है और समय से उपचार नहीं मिलने पर मरीज गहरे अवसाद में जा सकता है। ऐसे में वह खुद के अलावा दूसरों की जान के लिए भी खतरा बन सकता है।
एम्यूट साइको सिंड्रोम के मरीज जहां तत्काल कोई बड़ा कदम उठा लेते हैं तो वहीं एक्सटेंडेड साइको सिंड्रोम से पीड़ित खुद के साथ-साथ अपने से जुड़े परिवार के अन्य सदस्यों को भी नुकसान पहुंचा देते हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, सामाजिक और जैविक कारण से महिलाएं मानसिक रोग का शिकार अधिक होती हैं। अपने समाज में लड़कियों को बचपन से ही ऐसा माहौल दिया जाता है, जिसमें वे खुलकर अपनी बात किसी से साझा नहीं कर पातीं। वहीं लड़की जब बड़ी होकर महिला के रूप में जिम्मेदारी उठाती है, तब उसके दिमाग के किसी कोने में छिपा डर उसे और अधिक परेशान करता है।
ऐसे में अगर कोई महिला अजीबोगरीब हरकतें करने लगे, उसका स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाए तो यह उसके मानसिक रूप से बीमार होने के लक्षण हो सकते हैं। किसी भी उम्र में ऐसी नौबत आ सकती है। अमूमन हर 10 में से 6 महिलाएं मानसिक रोग की चपेट में आती हैं, जबकि पुरुषों में यह आंकड़ा 10 में 4 है।
जिला अस्पताल के नैदानिक मनोविज्ञान रमेंद्र त्रिपाठी बताते हैं कि मानसिक रोग की शुरुआत अनैच्छिक चिंताओं से होती है। धीरे-धीरे व्यक्ति अवसादग्रस्त हो जाता है। अगर समय से उपचार नहीं मिला तो वह कोई भी बड़ा कदम उठा सकता है। महिला जब अपनी बात घरवालों को नहीं समझा पाती, तब उसे लगता है कि कोई उसकी कद्र नहीं कर रहा। वह जल्द तनावग्रस्त हो जाती है। इसका असर उसके दैनिक कार्य व्यवहार पर दिखता भी है, लेकिन लोग इसे सामान्य व्यवहार मानकर उपचार नहीं कराते। गांवों में ऐसी हरकत करने पर महिलाओं की झाड़-फूंक होने लगती है, जिससे उसकी स्थिति और बिगड़ती चली जाती है।
मौसम और रोशनी का पड़ता है असर
बीआरडी मेडिकल कॉलेज के मानसिक रोग विभागाध्यक्ष डॉ. तापस कुमार आइच बताते हैं कि मौसम और रोशनी का मानसिक स्वास्थ्य से सीधा संबंध है। मानसिक रूप से परेशान व्यक्ति को अंधेरा और अकेलापन पसंद होता है। इसीलिए सर्दियों में आत्महत्या की दर गर्मी की अपेक्षा अधिक होती है। इसका वैज्ञानिक कारण यह माना जाता है कि सूर्य की रोशनी में रहने पर शरीर में डोपामिन और सेरेटोनिन का स्राव बढ़ जाता है। इन रसायनों की वजह से मूड अच्छा होता है। इसलिए मानसिक रोग का शिकार व्यक्ति सूर्य की रोशनी के बजाय अंधेरे में जाकर छिपता है। दुनिया भर में उत्तरी गोलार्द्ध के नजदीक बसे देशों में गंभीर मानसिक रोग के केस अधिक पाए जाते हैं।
बात करने से भर से बदल जाता है माहौल
मानसिक रोगियों को यह लगता है कि उसके घर, दोस्त या रिश्तेदारी के लोग उसकी समस्या को नहीं समझ रहे हैं। लोग उसे सहयोग नहीं कर रहे हैं। मनोचिकित्सक डॉ. आमिल हयात खान कहते हैं कि ऐसे मरीज के जीवन में छोटे-छोटे साइकोटिक एपिसोड चलते रहते हैं। ऐसे में अगर केवल मरीज की मन:स्थिति को समझते हुए उसकी बातों को ध्यानपूर्वक सुन लिया जाए और उसे सकारात्मक बातों की तरफ ले जाया जाए तो उसके विचारों में परिवर्तन आने लगते हैं। एक बार अगर वह डिप्रेशन की चेन तोड़ने में सफल हुआ तो फिर उसके ठीक होने में अधिक वक्त नहीं लगता। इसलिए मानसिक रोगियों से बात करना सबसे जरूरी है, जबकि ऐसे मामलों में लोग सबसे पहले मरीज से बात करना ही बंद कर देते हैं। इससे उसके मन में चल रहे नकारात्मक विचार और घने हो जाते हैं।
केस-1
झारखंडी इलाके की महिला के घरवाले बहुत परेशान थे। महिला का व्यवहार वैसे तो ठीक रहता था, लेकिन अचानक ही झगड़ने लगती थी। बच्चों को मारती-पीटती भी थी। किसी ने इसे भूत का साया बताया तो घरवाले गोपालगंज (बिहार) के झाड़-फूंक करने वाले के पास ले गए। इसने दो बार रेलवे ट्रैक पर जाकर जान देने की कोशिश भी की। अंत में उसे मनोचिकित्सक के पास ले गए। काउंसिलिंग में महिला ने बताया कि उसके पति और सास का व्यवहार उसके प्रति ठीक नहीं है। उसके साथ घर वालों की भी काउंसिलिंग हुई। करीब 6 माह तक उपचार के बाद अब यह परिवार खुशहाल जीवन बिता रहा है।
केस-2
देवरिया जिले की एक महिला रोज घरवालों के खाने में कभी नमक तो कभी कुछ डाल देती थी। कोई पूछता तो घर छोड़कर जान देने सड़क पर पहुंच जाती थी। परेशान होकर घरवालों ने उसे कमरे में बंद रखना शुरू कर दिया। इसे लेकर घर में झगड़े भी शुरू हो गए। महिला का पति दिल्ली में प्राइवेट नौकरी करता था। बच्चे भी उसके पास नहीं जाते थे। पति उसे मनोचिकित्सक के पास ले गया तो पता लगा कि महिला गहरे अवसाद में थी। दरअसल, वह पति और बच्चों के साथ रहना चाहती थी, जबकि पति उसे साथ नहीं ले जाता और बच्चे उसकी बजाय घर के दूसरे सदस्यों के पास रहते थे। करीब एक साल तक इलाज के बाद अब महिला पूरी तरह से स्वस्थ है।