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Gorakhpur News: आसान नहीं रही डगर...अपनों के चक्कर में फंसते रहे कार्यकारी निदेशक

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गोरखपुर। एम्स, गोरखपुर किसी काजल की कोठरी से कम नहीं है। सामानों की खरीद-फरोख्त और नियुक्ति के मामले में भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी हैं कि यहां अपना कार्यकाल बेदाग पूरा कर पाना आसान नहीं है। पिछले दो कार्यकारी निदेशक अपनों के चक्कर में फंसते गए और जांच के दायरे में इस कदर घिरे हैं, उनकी डगर आसान नहीं है।
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एम्स में अब तक तीन कार्यकारी निदेशक नियुक्त हुए हैं, जिसमें दो लोगों को अतिरिक्त कार्यभार सौंपा गया था। पहले कार्यकारी निदेशक डॉ संजीव मिश्रा थे। डॉ. मिश्र के समय एम्स में ओपीडी ही था और फिर कोविड काल रहा। इसके बाद एम्स ऋषिकेष से डॉ. सुरेखा किशोर को एम्स गोरखपुर का कार्यकारी निदेशक नियुक्त किया गया। डॉ. सुरेखा किशोर पर भ्रष्टाचार और गलत नियुक्ति का आरोप लगा। दो जनवरी 2024 को विजिलेंस की जांच रिपोर्ट के आधा पर डॉ. सुरेखा किशोर को हटा दिया गया। उनकी जगह एम्स पटना के कार्यकारी निदेशक डॉ. जीके पाल को गोरखपुर का अतिरिक्त कार्यभार दिया गया। जुलाई में डॉ. जीके पाल को तीन महीने का कार्य विस्तार मिला था। उनका कार्यकाल अब दो अक्तूबर को समाप्त हो रहा था। एम्स के नए कार्यकारी निदेशक के चयन के लिए काउंसलिंग की प्रक्रिया पूरी हो गई है, लेकिन अभी चयन में महीने भर का समय लगेगा। इसे देखते हुए पहले डॉ. जीके पाल को ही सेवा विस्तार दिए जाने की संभावना थी, लेकिन उनके बेटे की नियुक्ति में फर्जी सर्टिफिकेट लगाने के आरोप में जांच के चलते सेवा विस्तार पर ग्रहण लग गया।
डॉ. जीके पाल के पुत्र डॉ. ओरो पाल ने माइक्रोबायोलॉजी विभाग के पीजी क्लास में नामांकन कराया था। यह शिकायत हुई कि नामांकन के लिए पिछड़ी जाति का जो सर्टिफिकेट लगाया गया है, उसमें आय आठ लाख वार्षिक आय से कम दिखाई गई है, जबकि डॉ पाल और उनकी पत्नी मिलकर प्रतिवर्ष एक करोड़ के लगभग वेतन पाते हैं। डॉ. पाल पर बेटी को भी फर्जी सर्टिफिकेट के आधार पर एम्स पटना में पीजी में दाखिला कराने का आरोप है। माना जा रहा है कि आरोपों के चलते डॉ. पाल की सेवा को विस्तार नहीं दिया गया और तीन महीने के लिए अब डॉ. अजय कुमार सिंह को कार्यकारी निदेशक का अतिरिक्त प्रभार दिया गया है।
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