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Gorakhpur News: उपकरणों के दाम में खेल, सारे दावे फेल; 5 हजार वाला 14,000 में खरीद रहे मरीज- गहरी है इनकी पैठ

Wed, 19 Jun 2024 06:02 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर

सार

गोरखनाथ क्षेत्र के सोनू निषाद ने बताया-बाइक की ठोकर से मेरे 60 वर्षीय रिश्तेदार के पैर की हड्डी टूट गई थी। इमरजेंसी वार्ड से आर्थो वार्ड रेफर किया गया। डॉक्टर ने देखा और एक्स-रे आदि के बाद ऑपरेशन के लिए कहा। वार्ड बॉय ने छोटी सी पर्ची पकड़ाते हुए दुकान का पता बताया। हमने कुछ और दुकानों पर पता लगाया, लेकिन वह उपकरण टाउनहाल स्थित उसी दुकान पर मिली, जिसका पता वार्ड बॉय ने बताया था।
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जिला चिकित्सालय की इमरजेंसी के बाहर - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
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विस्तार
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अगर हड्डी के मर्ज से परेशान हैं तो ऑपरेशन के लिए जिला अस्पताल जाने से पहले यह जान लें कि वहां आर्थो वार्ड में दलालों का तगड़ा तंत्र है, जिसकी नजर आपकी जेब पर है। यहां ऑपरेशन के उपकरणों की खरीद में दलालों और मेडिकल स्टोर वाले की सेटिंग से मरीज के परिजनों को पांच की जगह 14 हजार रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं। कमिश्नर से शिकायत के बाद इस मामले की जांच भी शुरू हो गई है।
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जिला अस्पताल में सुविधाओं को लेकर अक्सर सवाल उठते रहते हैं, लेकिन आर्थो वार्ड का हाल और बदहाल है। वार्ड में भर्ती मरीजों को इलाज के दौरान सुविधाएं तो निजी अस्पतालों के आधी भी नहीं मिलतीं, लेकिन रकम उनके बराबर ही खर्च करनी पड़ रही है।

 

जिला अस्पताल का जिला चिकित्सालय पुरूष अर्थो वार्ड - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
आर्थो वार्ड में इंप्लांट (उपकरण) की खरीद की आड़ में बेबस मरीजों का आर्थिक शोषण किया जा रहा है। कर्मचारियों की मिलीभगत से दलालों का तंत्र मरीजों को मजबूर कर रहा है कि वे पांच हजार के उपकरण 14 हजार में खरीदें।

डॉक्टर की छोटी सी पर्ची टाउनहाल के एक खास दुकान पर जाती है और वहां से उपकरण सीधे ऑपरेशन थिएटर पहुंच जाता है। हर दिन चार से पांच उपकरण जिला अस्पताल के आर्थो वार्ड में आ रहे हैं।

गोरखनाथ क्षेत्र के सोनू निषाद ने बताया-बाइक की ठोकर से मेरे 60 वर्षीय रिश्तेदार के पैर की हड्डी टूट गई थी। इमरजेंसी वार्ड से आर्थो वार्ड रेफर किया गया। डॉक्टर ने देखा और एक्स-रे आदि के बाद ऑपरेशन के लिए कहा।

वार्ड बॉय ने छोटी सी पर्ची पकड़ाते हुए दुकान का पता बताया। हमने कुछ और दुकानों पर पता लगाया, लेकिन वह उपकरण टाउनहाल स्थित उसी दुकान पर मिली, जिसका पता वार्ड बॉय ने बताया था। वहां पहले से कई और लोग अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। वहां रुपये जमा करने पर दुकानदार ने बताया कि ऑपरेशन से आधे घंटे पहले वहां सामान पहुंच जाएगा। काफी प्रयास के बाद भी उसे 14 हजार रुपये देने पड़े।

इसी वार्ड में अपने चाचा का इलाज कराने आईं चौरीचौरा की वृंदावती ने बताया कि ऑपरेशन के लिए जो उपकरण खरीदने हैं, अगर वह किसी दूसरी दुकान से मंगा लिए जाएं तो ऑपरेशन की डेट टाल दी जाती है। कभी उपकरण की माप गलत तो कभी क्वालिटी खराब बताई जाती है।

इन दिक्कतों से बचने का सबसे अच्छा तरीका है कि कर्मचारियों को ही रुपये दे दिए जाएं। वे जब उपकरण मंगाते हैं, तो ऑपरेशन में भी मरीज को वरीयता देते हैं।
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जिला चिकित्सालय पुरूष अर्थो वार्ड - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
एक्स-रे कक्ष के बाहर होती है सेटिंग
जिनकी हड्डी टूटी है, उनके इलाज के लिए पहले एक्स-रे होता है। यहीं दलाल घूमते रहते हैं। जैसे ही उन्हें कोई ऐसा मरीज दिखता है, जिसको ऑपरेशन की जरूरत होती है, तो वे उसके परिजनों से बात-बात में ही अस्पताल की कई कमियां बताकर बाहर ऑपरेशन कराने की सलाह देते हैं।

आयुष्मान कार्ड भी तत्काल बनवाने और उससे ही इलाज का खर्च निकलने की बात कहते हैं। अगर इसके बाद भी मरीज के परिजन बाहर जाने को तैयार नहीं होते तो उन्हें अस्पताल में ही बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराने का भरोसा दिलाया जाता है। बस इसके लिए जेब ढीली करनी होती है।

अगर बात तय हो गई तो एक्स-रे, प्लास्टर और ऑपरेशन सब कुछ खटाखट हो जाता है। नहीं तो मरीज व तीमारदार को घंटों भटकना पड़ता है। यहां तक स्ट्रेचर भी मरीज के परिजनों को खुद ही खींचकर ले जाना पड़ सकता है।

परिजनों को नहीं दिखाते उपकरण

हड्डी जोड़ने के लिए लगने वाले इन उपकरणों के जानकार बताते हैं कि इसमें तीन तरह के रॉड का इस्तेमाल होता है। सबसे सस्ता सीमेंट, दूसरा स्टील और तीसरा टाइटेनियम का। टाइटेनियम का रॉड सबसे महंगा और अच्छा होता है, जबकि स्टील और सीमेंट वाले की गुणवत्ता बेहतर नहीं होती।

जिला अस्पताल के आर्थो वार्ड में जिस उपकरण के नाम पर मरीजों से वसूली की जाती है, दुकान पर रुपये जमा करने के बाद वह सीधे ऑपरेशन थिएटर पहुंच जाता है। मरीज या तीमारदार को पता भी नहीं चलता कि जो उपकरण लगाया गया है, उसकी क्वालिटी कैसी है।

जिला अस्पताल के एसआईसी डॉ राजेंद्र ठाकुर ने बताया कि सरकारी अस्पताल में उपकरणों की खरीद नहीं होती। आयुष्मान कार्ड के तहत होने वाले ऑपरेशन में इन उपकरणों का खर्च सरकार की तरफ से वहन किया जाता है। उपकरण खरीद के नाम पर मनमानी की शिकायतें मिली हैं, जिसकी जांच कराई जा रही है। जल्द ही व्यवस्था में बदलाव किया जाएगा।



 
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