गोरखपुर। कृषि विज्ञान केंद्र बेलीपार में आर्या परियोजना के तहत मशरूम उत्पादन तकनीक विषय पर आयोजित पांच दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम संपन्न हो गया। प्रशिक्षण के समापन सत्र को संबोधित करते हुए केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. एसपी सिंह ने बताया कि इस परियोजना में बेरोजगार युवाओं को प्रशिक्षित किया जाता है। बेरोजगार युवाओं के लिए मशरूम उत्पादन एक उत्तम व्यवसाय है।
उन्होंने कहा कि प्रशिक्षण के दौरान बताई गई उन्नत तकनीकों के आधार पर यदि मशरूम उत्पादन किया गया तो आर्थिक रूप से अत्यंत लाभदायक होगा। मशरूम की खेती की सबसे अच्छी बात यह होती है कि इसकी अलग-अलग किस्मों की खेती साल भर कर सकते हैं लिहाजा साल भर कमाई संभव है।
उन्होंने बताया कि देश में 10-12 वर्षों से मशरूम के उत्पादन में लगातार वृद्धि देखी जा रही है। केंद्र के पशुपालन वैज्ञानिक डॉ. एसके सिंह ने कहा कि मशरूम ऊर्जा का एक अच्छा स्रोत एवं न्यूनतम कैलोरी की सब्जी है। इसमें पानी अधिक (90 प्रतिशत) शुष्क अवयव कम (10 प्रतिशत) साथ ही वसा की मात्रा कम (0.6 प्रतिशत) होती है। वसा की कम मात्रा होने के कारण इसे मोटापा रोग, रक्तचाप एवं हृदय रोग के लिए उपयुक्त आहार माना गया है।
इनसेट-
मशरूम में उपलब्ध प्रोटीन उच्च गुणवत्ता का होता है
मशरूम में 2.5 से 3.5 प्रतिशत प्रोटीन की मात्रा पाई जाती है। सुखी हुई अन्य मशरूमों में प्रोटीन 25-30 प्रतिशत हो जाती है जिसकी पाचन क्षमता लगभग 70-90 प्रतिशत तक होती है। दूसरी सब्जियों की अपेक्षा मशरूम में उपलब्ध प्रोटीन उच्च गुणवत्ता का होता है।
सुरक्षा वैज्ञानिक शैलेंद्र सिंह ने बताया कि विश्व में खाने योग्य मशरूम की लगभग 10,000 प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनमें से 70 प्रजातियां ही खेती के लिए उपयुक्त मानी जाती हैं। भारतीय वातावरण में मुख्य रूप से पांच प्रकार के खाद्य मशरूमों की व्यावसायिक स्तर पर खेती की जाती है जिसमें सफेद बटन मशरूम, ढींगरी (ऑयस्टर) मशरूम, दूधिया मशरूम, पैडीस्ट्रा मशरूम और शिटाके मशरूम की खेती प्रमुख हैं।
बेहतर कमाई के लिए मशरूम की खेती एक अच्छा विकल्प है। इसके लिए लंबे-चौड़े खेत की जरूरत नहीं बल्कि एक कमरा ही काफी रहता है। कम जगह और कम लागत के बाद भी किसानों को कुल खर्च का तीन गुना तक आय होती है। सालभर में सिर्फ एक कमरे में 3 से 4 लाख रुपये की आय आसानी से हो सकती है।वह भी सिर्फ 50 से 60 हजार रुपये खर्च करने के बाद।