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नाथपंथ ने समन्वय, समता और समरसता पर किया गंभीर कार्य : प्रो. विश्वनाथ तिवारी

Mon, 16 Sep 2024 05:48 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, गोरखपुर
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गोरखपुर। पद्मश्री प्रो. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने कहा कि समाज एक अमूर्त शब्द है। हर व्यक्ति की वेदनाएं अलग होती हैं। सारा संसार अपनी अपनी आग में जल रहा है। विषम ताप से विश्व विपुल संत्रस्त है। संत, महात्मा, ऋषि नैतिक आधार पर ही समाज को समरस बनाते हैं। नाथपंथ ने समन्वय, समता और समरसता पर गंभीर कार्य किया है।
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वे रविवार को दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय व हिंदुस्तानी अकादमी, प्रयागराज संयुक्त तत्वावधान में नाथ पंथ पर आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के समापन समारोह में रविवार को बतौर मुख्य अतिथि अपना विचार व्यक्त कर रहे थे। उन्होंने कहा कि शंकराचार्य से लेकर भक्ति काल के बीच 350 वर्ष का सबसे तेजस्वी व प्रतापी व्यक्तित्व गुरु गोरखनाथ का है। उन्होंने कहा कि गुरु गोरखनाथ का समय बौद्ध, जैन, शैव, शाक्त आदि में गहरे मतांतर का समय था। ऐसी स्थिति में उन्होंने प्रतिद्वंदिता, धार्मिक उथल-पुथल, इस्लाम का प्रवेश, रूढ़ियों में जकड़े लोग, छुआछूत, जाति-पाति को मिटाकर समाज को समरस किया। नाथपंथ ने समन्वय, समता, समरसता का अपने समय में गंभीर प्रयास किया। गुरु गोरखनाथ का समय राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक आदि दृष्टि से बहुत ही विषम समय था। गुरु गोरखनाथ व नाथ पंथ ने इसे समरस बनाने की दिशा में बहुत बड़ा काम किया।

समापन समारोह की अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. पूनम टंडन ने कहा कि यह संगोष्ठी का समापन है, पर समरसता का आगाज है। इस संगोष्ठी के माध्यम से प्रज्वलित समरसता की मशाल अनवरत समाज को प्रेरित व प्रकाशित करती रहेगी। उन्होंने कहा कि इस संगोष्ठी से हमें जो मॉडल मिला है उसे जीवन में हम उतारे वह दूसरों को भी जोड़ें, तभी संगोष्ठी सफल मानी जाएगी।
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जननायक चंद्रशेखर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर संजीत गुप्ता ने कहा कि समरस समाज में मनुष्य व मनुष्यता का महत्व होता है। धर्म और उसपर आधारित नीतियों पर चलकर ही समरस समाज का निर्माण हो सकता है। इसके लिए परस्पर अनुकूलता और सहयोग का भाव होना चाहिए। उन्होंने कहा कि महंत दिग्विजय नाथ ने समाज को समरस बनाने में शिक्षा को महत्वपूर्ण मानते हुए उस दिशा में गंभीर कार्य किया।

विशिष्ट अतिथि प्रो. चितरंजन मिश्र ने संबोधित करते हुए कहा कि समरस समाज कैसे बनेगा, इसके कारणों की तलाश करनी होगी। अधिष्ठाता, कला संकाय प्रो. राजवंत राव ने कहा कि कोई भी धर्म या पंथ अपने समय की क्रांति है, वह मनुष्य के जीवन को बेहतर बनाने और अपने समय के प्रश्नों को हल करता है। हर युग के मनुष्य की अपनी समस्या होती है। अधिष्ठाता, छात्र कल्याण प्रो. अनुभूति दूबे ने कहा कि नाथपंथ पर पहले भी संगोष्ठी एवं विमर्श होता रहा। नाथपंथ पर होने वाली प्रत्येक संगोष्ठी ने नया बेंच मार्क स्थापित किया है।

समापन सत्र का संचालन डॉ. संजय तिवारी ने किया। संगोष्ठी के समन्वयक डॉ. कुशलनाथ मिश्र ने स्वागत वक्तव्य दिया। संगोष्ठी के संयोजक डॉ. अमित उपाध्याय ने आभार ज्ञापन किया। संगोष्ठी के आयोजन सचिव डॉ. सूर्यकांत त्रिपाठी ने प्रतिवेदन व्यक्त किया। हिंदुस्तानी अकादमी, प्रयागराज के सचिव देवेंद्र प्रताप सिंह समेत सभी अधिकारी एवं कर्मचारी उपस्थित रहे।
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