गोरखपुर। गीता प्रेस अपनी स्थापना का शताब्दी वर्ष पूरा कर चुका है। इन सौ सालों में उसने कभी भी विज्ञापन नहीं छापा है। बातते हैं कि जब मासिक पत्रिका कल्याण के प्रकाशन की बात चल रही थी तब उसके संपादक हनुमान प्रसाद पोद्दार को महात्मा गांधी ने सुझाव दिया था कि पत्रिका में कभी विज्ञापन मत छापिएगा। उन्होंने पुस्तक समीक्षा भी न छापने का सुझाव दिया था। गीता प्रेस आज तक इसका अनुपालन करता आ रहा है। उसने घाटे की भरपाई के लिए वैकल्पिक व्यवस्था बनाई है। ऋषिकेश में आयुर्वेद की फैक्ट्री लगाई है तो कई शहरों में कपड़े की दुकानें खोल रखी हैं। इनकी आय से वह पुस्तकों के प्रकाशन पर होने वाले घाटे की भरपाई करता है।
गीता प्रेस का नाम लेते ही हर किसी के जेहन में सस्ती, आकर्षक और धार्मिक संदेश देने वाली पुस्तकें घूमने लगती हैं। आज के वैश्विक युग में सादगी, आध्यात्मिक और गैर राजनैतिक कार्य पद्धति गीता प्रेस की पहचान है। यही वजह है कि अपनी अब तक की यात्रा में गीता प्रेस प्रबंधन ने खुद को व्यावसायिक दृष्टिकोण से अलग रखा है।
अगर प्रबंधन की तरीका सीखना है तो गीता प्रेस इसका बेहतर उदाहरण है। बिना लाभ और हानि के सिद्धांत पर काम कर रही यह संस्था दुनिया में धार्मिक पुस्तकें पहुंचा रही है। बहुत ही कम लोग जानते हैं कि गीता प्रेस लागत से 30 से 60 फीसदी तक कम दाम पर पुस्तकें उपलब्ध करा रहा है। आय और व्यय का संतुलन बना रहे इसके लिए प्रबंधन ने आय के अन्य संसाधन विकसित किए हैं।
दरअसल, गीताप्रेस गोविंद भवन कार्यालय ट्रस्ट कोलकाता की एक इकाई है। यह ट्रस्ट नो प्राॅफिट नो लॉस के सिद्धांत पर कार्य करता है। घाटे से प्रभावित हुए बिना गीता प्रेस धर्म की सेवा के लिए पुस्तकों का प्रकाशन करता रहे इसलिए गोविंद भवन कार्यालय ट्रस्ट ने आय के अन्य संसाधनों का विकास किया। इस आय से गीताप्रेस का घाटा पूरा किया जाता है। इसके लिए कपड़ों की तीन दुकानें गोरखपुर, कानपुर व ऋषिकेश में खोली गईं, जो नियमित आय का बड़ा स्रोत हैं। इनके अलावा गोरखपुर में करीब दस दुकानें गीताप्रेस भवन में हैं, जो किराए पर दी गई हैं। ऋषिकेश में आयुर्वेद की दवाओं की फैक्ट्री है, जो फायदे में रहती है। वहीं, अगर पुस्तक का एक संस्करण निकल गया और उसके बाद कागज के दाम में गिरावट आती है तो भी गीताप्रेस दूसरे संस्करण की पुस्तकों का दाम कम नहीं करता है। इससे बाजार का संतुलन बना रहता है। इससे होने वाली बचत से भी गीता प्रेस का कुछ घाटा पूरा हो जाता है।
एक रुपये से 1500 रुपये तक की हैं पुस्तकें
गीता प्रेस की सबसे सस्ती पुस्तक एक रुपये की है और सबसे महंगी 1500 रुपये की है।
संपूर्ण गीता एक रुपये में तो हनुमान चालीसा को दो रुपये में पाठकों तक पहुंचाया जाता है। वहीं, गीताप्रेस से प्रकाशित होने वाली सबसे महंगी पुस्तक शिव महापुराण होगी। इसमें 200 चित्र होंगे। इसकी कीमत 1500 रुपये रखी गई है। आर्ट पेपर पर छपने वाली इस पुस्तक में
1,088 पृष्ठ होंगे।
-
शताब्दी वर्ष में किया 100 करोड़ की पुस्तकों का प्रकाशन
29 अप्रैल, 1923 को गीता प्रेस की स्थापना हुई थी। 100 वर्षों से गीता प्रेस लोगों में अनवरत आध्यात्मिक चेतना को समृद्ध कर रहा है। डिजिटल युग में भी गीता प्रेस के पाठकों की संख्या लगातार बढ़ी है। अपने शताब्दी वर्ष में 100 करोड़ रुपये मूल्य से अधिक पुस्तकों का प्रकाशन किया है।
कोट
गीता प्रेस की स्थापना के समय ही संस्थापक जयदयाल गोयंदका ने आय के स्रोतों की व्यवस्था कर दी थी, ताकि भगवान की सेवा में कभी किसी तरह का विघ्न न आए और समाज के अंतिम व्यक्ति तक भगवान की वाणी धार्मिक पुस्तक के रूप में पहुंचती रहे। गोयंदका के बाद जो भी इस सेवा कार्य के लिए आगे आया उसने इसी सिद्धांत पर काम करते हुए परंपरा को आगे बढ़ाया है।
- देवी दयाल अग्रवाल, ट्रस्टी गीता प्रेस
समय के साथ हुआ बदलाव
समय के साथ गीता प्रेस ने बदलाव भी किया है। आज उसकी प्रिंटिंग मशीनें आधुनिक हैं। प्रिंटिंग के लिए जापान की कोमोरी और सिलाई के स्विटजरलैंड के आधुनिक मशीन का प्रयोग किया जा रहा है।