साहित्यकार प्रो. रामदेव शुक्ल ने कहा कि युवाओं को जिस विश्वविद्यालय में सबसे पहले शिक्षित होना चाहिए, उस विश्वविद्यालय में ही बहुत गहरा बदलाव आया है। युवाओं का यह विश्वविद्यालय है उनका परिवार। उनके माता-पिता। आज के माता-पिता भौतिकता की बाढ़ में इस तरह बह गए हैं कि बच्चों को संस्कार देने की बात प्राथमिकता में आ ही नहीं पा रही है। ज्यादातर घरों में किताबों का कोना सिमट रहा और टीवी, मोबाइल, टैबलेट, लैपटॉप की जगह बढ़ती जा रही है।
तमाम घरों में माता-पिता, दोनों काम करने वाले हैं। उनकी अपनी व्यस्तता है। इस व्यस्तता की वजह से बच्चों को जिस तरह से पालना चाहते हैं, वैसे पाल नहीं पाते। बच्चा रोता है तो उसे चुप कराने के लिए मोबाइल पकड़ा दिया जाता है। मां को किचन में काम करना है तो वह बच्चे को मोबाइल खेलने के लिए दे देती है ताकि वह व्यस्त रहे। बचपन से ही परिवार में मोबाइल की महत्ता को देख बच्चे के लिए भी यह महत्व की चीज हो गई है।
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इस मोबाइल की जगह यदि बचपन में खिलौने और होश संभालने के साथ ही हाथ में किताबें पकड़ाने की आदत विकसित की जाए तो तस्वीर दूसरी होगी। ऐसा भी नहीं है कि किताबों के कद्रदान कम हो रहे हैं, दरअसल लेखक और प्रकाशक भी ईमानदारी से काम नहीं कर रहे। बाल साहित्य पर ठीक से काम नहीं हो रहा। खुद अज्ञेय जी जैसे बड़े कवि और कथाकार कहते थे कि वह अभी इतने परिपक्व नहीं हुए कि बाल साहित्य लिख सकें। इसके लिए अपने भीतर बच्चा पैदा करना होगा।
साहित्यकार डॉ रंजना जायसवाल ने कहा कि घर के माहौल का बच्चों पर बड़ा असर पड़ता है। पहले दादी-नानी पढ़ी-लिखी नहीं होती थी तो भी रामायण-महाभारत की प्रेरणादायी कहानियां सुनाती थीं। अब पढ़े-लिखे होने के बाद भी मां-बाप घर पर किताबों को कम या ना के बराबर समय दे रहे हैं। अखबार तक पढ़ने की आदत छूट रही है। व्यापार, नौकरी से लौटने के बाद लोगों के हाथ में टीवी का रिमोट या फिर मोबाइल आ जा रहा है। बिस्तर पर सोने के समय तक लोग घंटों रील देख रहे हैं। बगल में बच्चा भी यही देख रहा है। परिवार ही बच्चे की पहली पाठशाला होती है। ऐसे में जो परिवार में होगा, बच्चा भी तो वहीं सीखेगा। फिर अकेले बच्चे को दोष देना ठीक नहीं।
किताबों से दूरी बना रही तात्कालिकता
साहित्यकार डॉ. केसी लाल ने कहा कि संस्कार, नैतिकता विकसित करने के साथ ही अपने धर्म, संस्कृति, समाज को समझने के लिए किताबें सबसे सशक्त माध्यम हैं। मगर अब बच्चों ही नहीं बड़ों में भी पढ़ने की आदत खत्म हो रही है। यह सब नए माध्यमों का तात्कालिक प्रभाव है। अभी इंटरनेट, मोबाइल का प्रसार हुआ है।
मनोरंजन के नए साधन विकसित हुए हैं। ऐसे में गंभीर अध्ययन के प्रति लोगों का मन हट गया है। इसका दुष्परिणाम क्या और कितना होगा, अभी यह साफ कह पाना तो मुश्किल है मगर इतना जरूर है कि जीवन के प्रति लोगों की गंभीरता खत्म हो गई है। लोग तात्कालिकता में जी रहे हैं। इंटरमीडिएट में पढ़ने वाले बच्चों तक के मन में इच्छा है कि वह बस किसी तरह बड़ा पैकेज पा जाए। ज्ञानार्जन कर अपने को सक्षम बनना लक्ष्य नहीं रह गया है। यह तात्कालिकता अवसाद को जन्म देती है। किताबों से ज्ञानार्जन होता है। मगर तात्कालिकता किताबों से दूरी बना रही है।