अवैध रूप से धंधा कर रहे नकली स्टांप वालों ने 40 साल से धंधा जमाया है, ऐसे में कई लोगों की पुरानी रजिस्ट्री भी नकली स्टांप पर हो सकती है। इस मामले के खुलने के बाद से लोग फर्जी स्टांप को लेकर परेशान हैं। इसे देखते हुए प्रशासन ने बड़ा फैसला लिया है कि वह पूरी तरह से वैध होंगे। जिस भी संपत्ति की रजिस्ट्री में फर्जी स्टांप का इस्तेमाल हुआ होगा, उनकी वैधता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।
यदि ऐसा कोई विलेख पकड़ में भी आता है तो मुख्य रूप से वेंडर आदि ही हाेंगे जो जांच के दायरे में फंसेंगे। दरअसल, फर्जी स्टांप के मामले खुलते ही इस पर भी चर्चा शुरू हो गई थी कि जिन संपत्तियों की रजिस्ट्री में इन स्टांपों का प्रयोग हुआ होगा, उस संपत्ति की स्थिति क्या होगी।
इस मामले में एडीएम वित्त एवं राजस्व विनीत सिंह व एआईजी स्टांप प्रदीप राणा का कहना है कि स्टांप फर्जी है, इसकी जानकारी कर पाना आमजन के लिए कठिन है। यह पुलिस की जांच का मामला है। यदि किसी संपत्ति या पंजीकृत वसीयत या अनुबंध में फर्जी स्टांप का प्रयोग पकड़ में भी आता है तो संबंधित संपत्ति की रजिस्ट्री, वसीयत आदि प्रभावित नहीं होगी।
फर्जी स्टांप-नकली नोट में पारदर्शी इंक का इस्तेमाल..जड़ तलाश रही पुलिस
फर्जी स्टांप, नकली नोट छापने वाला गिरोह चार तरह की इंक का इस्तेमाल करता था, लेकिन सबसे खास पारदर्शी इंक है। इसका इस्तेमाल लिमिटेड फर्म और सरकारी कामों में ही किया जाता है। यही वजह है कि पुलिस अब इसकी जड़ तलाश रही है कि आखिर कहां से इन्हें इंक मिलती थी। स्टांप में इस्तेमाल होने वाले सिल्वर तक तो पुलिस पहुंच गई, लेकिन रद्दी कागज और इंक की गुत्थी अभी नहीं सुलझ सकी है।
पुलिस अब पटना के उस युवक की तलाश में है, जो इसकी सप्लाई करता था, जिसके पकड़े जाने के बाद ही पूरा मामला खुलकर सामने आएगा। खबर है कि पुलिस के रडार पर कई और वेंडर भी हैं, जो इस धंधे में लिप्त थे। पुलिस ने उनकी भी सरगर्मी से तलाश शुरू कर दी है।
जानकारी के मुताबिक, फर्जी स्टांप में इस्तेमाल होने वाला सिल्वर राजस्थान से सस्ते दाम के स्टांप पेपर से ही निकाले जाते थे। पुलिस की जांच में यह साफ हो गया है कि यह लोग कम कीमत के स्टांप को खरीदकर लाते थे और उसे पानी में कुछ देरी तक डाल देते थे।
गलने के बाद उसमें से सिल्वर निकाल लेते थे। फिर इसका ही इस्तेमाल करके नकली स्टांप पेपर तैयार किया जाता था, लेकिन पारदर्शी इंक यह लोग कहां से लाते थे, इसका भेद खुलना अब भी बाकी है। पुलिस इन सब के पीछे के नेटवर्क को खंगाल रही है। क्योंकि आम आदमी को पारदर्शी इंक नहीं मिल पाता है और इसकी खपत भी बतानी होती है।
बेटे और नाती ने संभाला था नकली नोट का धंधा
40 साल से धंधा करने वाला कमरुद्दीन स्टांप बनाता था, लेकिन उसकी शुचिता आसानी से पकड़ में आ जाती थी। यही वजह है कि धंधा शुरू करने के कुछ साल बाद ही वह 1986 में दबोच भी लिया गया था।
वह अपने समय में कम संख्या में ही बनाता था, लेकिन जब उसका नाती साहेबजादे रसायन विज्ञान, कंप्यूटर और एप का माहिर हो गया तो उसने इस नई तकनीक का इस्तेमाल करके स्टांप को बाजार में उतार दिया। बेटे और नाती के आने के बाद ही नकली नोट का धंधा इन लोगों ने मिलकर शुरू कर दिया। क्योंकि, पहले नकली नोट को असली नोट की शक्ल देना आसान नहीं था।
कई वेंडर राडार पर, पुलिस कर रही तलाश
पुलिस की जांच में कई और वेंडर सामने आ गए हैं, जो इस धंधे से जुड़े हैं। अब पुलिस उनकी तलाश कर रही है। जांच में यह पहले ही साफ हो चुका है कि खरीदने वाले को भले ही नहीं मालूम था, लेकिन वेंडरों को अच्छी तरह से मालूम है कि वह फर्जी स्टांप को बेच रहे हैं। इसके पीछे वह मोटा मुनाफा कमाते थे। इसी वजह से पुलिस इन्हें असल दोषी मानते हुए तलाश में जुटी है।
एसएसपी गौरव ग्रोवर ने बताया कि एसआईटी पूरे प्रकरण की गहनता से जांच कर रही है। जांच में जो भी दोषी होगा, उसपर साक्ष्यों के आधार पर कार्रवाई की जाएगी।