गोरखपुर। मंकीपॉक्स एक वैश्विक बीमारी है। हाल के वर्षों में इसके मरीजों की संख्या में तेजी से वृद्धि देखी गई है। इसके प्रभाव में भारत समेत 100 देश हैं। इस बीमारी के संक्रमण के फैलाव का पता लगाने के लिए दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के इंडस्ट्रियल माइक्रोबायोलॉजी के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. साहिल के निर्देशन में शोध हुआ। अध्ययन में दुनिया भर से इकट्ठा किए गए 404 मंकीपॉक्स वायरस के जीनोम का विश्लेषण किया गया। परिणाम स्वरूप पाया गया कि मंकीपॉक्स वायरस के जीन ओपीजी 153 में विशेष रूप से ''''एटीसी'''' मोटिफ समय के साथ घट रहे हैं, जिसके कारण संक्रमण की दर बढ़ी है। इस वायरस की मनुष्यों को बीमार करने की क्षमता कम हो गई है। सामान्य पीसीआर विधि से इस वायरस की पहचान किया जा सकता है।
इस शोध में गोरखपुर विश्वविद्यालय के इंडस्ट्रियल माइक्रोबायोलॉजी विभाग में कार्यरत डॉ. साहिल महफूज, देवरिया जिले के भाटपार रानी के रहने वाले सीएसआईआर-आईजीआईबी, नई दिल्ली में वैज्ञानिक डॉ. जितेन्द्र नारायण और उनकी शोध छात्र प्रीति अग्रवाल ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह महत्वपूर्ण अध्ययन हाल ही में प्रतिष्ठित जर्नल ''''''''वायरस एवोलुशन'''''''' में ''''''''कम्पेरेटिव जीनोम एनालिसिस रीवील्स ड्राइविंग फोर्सेज बिहाइंड मंकीपॉक्स वायरस एवोलुशन एंड शेड्स लाइट ऑन द रोल ऑफ एटीसी ट्रिन्यूक्लियोटाइड मोटिफ'''''''' शीर्षक के अंतर्गत प्रकाशित हुआ है।
डॉ. साहिल के अनुसार, 53 अलग-अलग देशों से 1,718 जीनोम सीक्वेंसेस का एक व्यापक डेटासेट प्राप्त किया गया। जिन्हें सितंबर 2022 तक सीक्वेंसिंग किया गया था। 404 सही क्वालिटी के सीक्वेंसेस आगे के शोध में उपयोग करने पर पाया की जीन ओपीजी 153 जो की वायरस की रोगजनकता का प्रमुख कारण है। समय के साथ उसमें उपस्थित माइक्रो सेटेलाइट (डीएनए में बार-बार आने वाले क्रम) की संख्या में कमी हुई है। इसी कमी के कारण उसके संक्रमण की दर में इज़ाफ़ा हुआ है, लेकिन इस कमी के कारण मनुष्य में उसकी रोगजनकता घटी है। डॉ. जितेन्द्र के अनुसार, उन्हें इस शोध में कुछ ऐसे डीएनए मोटिफ भी मिले हैं जो सभी मंकीपॉक्स वायरस में संरक्षित हैं। उन्होंने बताया कि इन संरक्षित मोटिफ का उपयोग सामान्य पीसीआर विधि द्वारा वायरस की पहचान में किया जा सकता है।
वर्ष 1970 में पहली बार प्रकाश में आई थी बीमारी
मंकीपॉक्स एक पशुजन्य बीमारी है जो पहली बार 1970 में पश्चिमी और मध्य अफ्रीका में देखी गई थी। यह रोग वायरस के कारण होता है जो संक्रमित जानवरों से मनुष्यों में फैलता है। मंकीपॉक्स वायरस घावों, शारीरिक तरल पदार्थों, श्वसन की बूंदों और दूषित वस्तुओं के सीधे संपर्क से एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैल सकता है। मंकीपॉक्स के लक्षण चेचक के लक्षणों से मिलते-जुलते होते हैं, जिनमें बुखार, सिरदर्द, ठंड लगना, शारीरिक कमजोरी और लिम्फनोड की सूजन शामिल हैं। प्रारंभिक लक्षणों के बाद मरीजों को त्वचा पर दाने और घाव दिखाई देने लगते हैं, जो आमतौर पर चेहरे, हाथों और पैरों पर होते हैं।
संक्रमण की दर में बदलाव को समझने में उपयोगी है यह शोध
गोरखपुर विश्वविद्यालय के इंडस्ट्रियल माइक्रोबायोलॉजी विभाग के समन्वयक और वनस्पति विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. अनिल कुमार द्विवेदी ने कहा है कि यह शोध वायरस के संक्रमण की दर में होने वाले बदलाव को समझने में अत्यंत उपयोगी है। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के अध्ययन से वायरस के व्यवहार और उसके फैलाव के पैटर्न को समझने में मदद मिलती है, जिससे बेहतर रोकथाम और उपचार के तरीके विकसित कर सकते हैं।
अन्य वायरस पर भी हो इस प्रकार का शोध
डीडीयू की कुलपति प्रो. पूनम टंडन ने शोधकर्ताओं को बधाई देते हुए कहा कि इस तरह के शोध अन्य वायरस पर भी होने चाहिए ताकि समय पर उनके संक्रमण को रोका जा सके। उन्होंने जोर देकर कहा कि वैज्ञानिक अनुसंधान और अध्ययन महामारी विज्ञान को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और इससे नई बीमारियों से निपटने के लिए तैयार रहने में मदद मिलती है।