गोरखपुर। सिंधी समाज के आराध्य भगवान झूलेलाल की उपासना का चालिहो पर्व शुरू हो गया है। 25 अगस्त तक भक्त सुबह और शाम भगवान झूलेलाल का पूजन-अर्चन और आरती कर भगवान झूलेलाल के प्रति आस्था निवेदित करेंगे। इस बीच सिंधी समाज के महिलाओं की जिम्मेदारियां काफी बढ़ गई हैं। आधुनिकता के दौर में पारंपरिक तरीके से इस त्योहार को मनाया जाए, इसके लिए महिलाएं जुटी हैं।
चालिहो पर्व के दौरान सिंधी समाज की महिलाओं के दिन की शुरुआत सुबह स्नान के बाद भगवान झूलेलाल के पूजन-अर्चन और ज्योत जलाने से होती है। इन दिनों सिंधी परिवारों में सात्विक भोजन बनता है। रसोई में लहसुन और प्याज तक का इस्तेमाल नहीं होता, ऐसे में महिलाएं साफ-सफाई का विशेष ख्याल रखती हैं। शाम को फिर से स्नान कर महिलाएं भगवान झूलेलाल के लिए भोग तैयार करती हैं, इसमें देशी घी का हलवा और काले चने से बने घुघनी विशेष रूप से शामिल होते हैं।
भोग तैयार कर महिलाएं भगवान झूलेलाल की पूजा-अर्चना करती हैं और फिर तैयार भोग को उन्हें अर्पित करती हैं। इसके बाद घर के सभी सदस्य इस प्रसाद को ग्रहण करते हैं। चालिहो पर्व के अंतिम नौ दिन महिलाएं व्रत भी रखती हैं और अंतिम दिन हर्षोल्लास के साथ झूलेलाल महोत्सव में शामिल होती हैं।
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कोट
चालिहो पर्व सिंधी समाज के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है। सुबह और शाम भगवान झूलेलाल की पूजा-अर्चना के साथ भोग तैयार करती हूं। यही भोग परिवार के सभी सदस्य ग्रहण करते हैं।
पायल कुकरेजा, जटाशंकर
चालिहो पर्व का इंतजार सिंधी समाज की महिलाएं बेसब्री से करती हैं। ये सिंधी समाज का सबसे बड़ा पर्व है। इन दिनों घर में साफ-सफाई का विशेष ख्याल रखती हैं।
मोहिनी करमचंदानी, बैंक रोड
आधुनिकता के दौर में भी सिंधी समाज की महिलाएं परंपरा निर्वहन कर रही हैं। जैसे पहले हम इस पर्व को मनाते थे वैसे ही आज भी मनाते हैं। इसमें कोई बदलाव नहीं हुआ है।
उषा देवी, कल्याणनगर
भगवान को हलवा और चने का भोग लगाती हूं। इन दिनों में घरों में सात्विक भोजन बनता है। ऐसे में साफ-सफाई का विशेष ख्याल रखती हूं। खाने में लहसुन और प्याज का इस्तेमाल नहीं करती हूं।
शालिनी, जटाशंकर