11 जनवरी 2011 को धर्मशाला के उस मकान में कुछ हल्की सी आवाज हुई होगी। शायद रिवाल्वर में साइलेंसर लगा हुआ था। गोली बहुत नजदीक से मारी गई थी। मारने वाले को उस घर का चप्पा-चप्पा पता था, क्योंकि कब वह आया, कब काम तमाम किया, कब चला गया, यह घरवालों को भी नहीं पता चला।
अचानक बेटी पहुंची तो पिता को फर्श पर गिरा देखा, जहां पिता गिरे थे बगल में ही हीटर था। बेटी चिल्लाई, घरवाले दौड़े। समझे हीटर पर गिरने की वजह से झुलस गए हैं। लेकर अस्पताल दौड़े। समय यही रात के कोई आठ बजे थे, जब जिला अस्पताल के डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। यह भी बताया कि गोली मारी गई है, यह सुनकर घरवालों के होश उड़ गए। हम बात कर रहे हैं कि रामलीला धर्मशाला कमेटी के महामंत्री कक्कू यादव की हत्या की।
कुछ ऐसा ही 10 महीने बाद फिर 9 नवंबर 2011 को भी हुआ। सब कुछ उसी तर्ज पर हुआ था। शायद वही रिवाल्वर, वही साइलेंसर, इस बार रामलीला कमेटी के महामंत्री हरिमोहन शर्मा की हत्या की गई। घर के बाहर हुई हत्या में भी शायद हल्की आवाज हुई होगी, जिसे कोई सुन नहीं पाया था। पड़ोसी ने हरिमोहन को गिरा देखकर घरवालों को जानकारी दी।
बेटा विकास दौड़ा तो लोगों ने सोचा चोट लगने से हरिमोहन घायल हो गए। हरिमोहन को लेकर अस्पताल भागे जहां डॉक्टर ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। इस बार भी गोली उसी तरह से मारी गई थी, जैसे पहली बार रामलीला कमेटी के महामंत्री कक्कू यादव को मारी गई थी। दोनों ही हत्याओं का तरीका कुछ एक-सा था, इन दोनों हत्याओं में शूटर का इस्तेमाल हुआ, यह तो पुलिस ने बता दिया मगर ना शूटर पकड़े गए और ना ही मामले का पर्दाफाश हो सका।
इन दोनों ही हत्याओं का जिक्र आते ही तमाम लोग सरगोशी (कानाफूसी) करते हैं। कुछ इशारे करते हैं। एकांत में जो कुछ बताते हैं, वह कातिल तक पहुंचने के लिए एक अहम सुराग है। कुछ तो यह भी कहते हैं कि वारदात किसने करवाई, उन्हें पता है, मगर खुलकर कोई बोलता नहीं? उस वक्त तैनात रहे पुलिस वाले हों या फिर उनके घर वाले नाम लेने से भी डरते हैं।