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गोरखपुर: अभी तो बस एक नवजात को मिला है न्याय, बड़ी लड़ाई तो बाकी है...

Mon, 24 Feb 2020 02:32 PM IST
vivek shukla डिजिटल न्यूज डेस्क, गोरखपुर।
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नवजात शिशु। फाइल - फोटो : अमर उजाला
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यह चिंगारी 24 सितंबर 2019 की है जो 31 जनवरी 2020 को झाड़ियों में एक नवजात बच्ची की लाश मिलने पर भड़क कर शोला बन गई। बच्ची को जन्म के बाद पटक-पटककर मौत के घाट उतार दिया गया था। क्या हुआ था, 24 सितंबर को? गोरखपुर जंक्शन पर कपड़े में लिपटा एक लावारिस नवजात मिला। जीआरपी का रवैया इंतहा की हद तक असंवेदनशील। जैसे कोई लाश मिली हो, रोजनामचे पर अंकित किया, कृपा इतनी की कि पोस्टमार्टम के लिए नहीं भेजा, चाइल्ड लाइन भेज दिया।

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यह सब तब जब, एकदम स्पष्ट कानून है, यदि कोई अभिभावक 12 साल से कम उम्र के बच्चे की जान जोखिम में डालते हुए असुरक्षित छोड़ता है तो उसके खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 317 के तहत और यदि पैदाइश छिपाने के लिए कोई नवजात को मृत या जीवित फेंकता है तो धारा 318 के तहत कार्रवाई हो सकेगी। सवाल है, आखिर कार्रवाई होगी कब? जब मुकदमा दर्ज होगा न।

गोरखपुर में मासूम बच्चों के हित संरक्षण के इस कानून के तहत मुकदमा दर्ज करना तो पुलिस की अकर्मण्यता की भेंट चढ़ गया था। बहाना, वादी नहीं किसकी तहरीर पर मुकदमा दर्ज करें। संज्ञेय अपराध सात साल तक की सजा, कमाल है, इसमें भी पुलिस वादी तलाश रही है।
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बहरहाल, अमर उजाला ने 24 सितंबर 2019 को ही ठान लिया कि उस हर लावारिस नवजात की कानूनी लड़ाई वह लड़ेगा, जिसे उसे मां-बाप ने चाहे लिंग भेद के लिए, चाहे अपने अनैतिक कृत्यों को छुपाने के लिए सड़कों, गलियों, नदी-नालों, झाडियों में फेंक दिया हो।

मकसद साफ है कि अगर ऐसे बेरहम माता-पिता की पहचान कर, उनके खिलाफ प्रभावी कानूनी कार्रवाई हो सकी तो ऐसा करने से पहले वे लाख बार सोचेंगे और अगर इस प्रयास में एक भी नवजात सड़क पर फेंके जाने से बच गया तो हमारी मुहिम सार्थक हो जाएगी। अमर उजाला के  संकल्प को तत्कालीन डीजीपी ओम प्रकाश सिंह का समर्थन मिला, उन्होंने आदेश जारी किए कि धारा 317-318 आईपीसी के तहत मुकदमे दर्ज करके कार्रवाई हो।


 
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अभी बड़ी लड़ाई बाकी है...

हालांकि आदेश के बावजूद पीपीगंज में छह नवंबर और बड़हलगंज में आठ नवंबर को लावारिस नवजात मिलने पर पुलिस ने एफआईआर नहीं दर्ज की तो नहीं की। अलबत्ता 18 नवंबर को गोला थाने के गांव मसहा और चौरीचौरा में लावारिस मिलने पर एसएसपी डॉ. सुनील कुमार गुप्ता की पहल पर गोरखपुर पुलिस ने पहली बार खुद वादी बनकर धारा 317 आईपीसी के तहत मुकदमा दर्ज किया। ऐतिहासिक। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक 1860 में बने इस कानून को गोरखपुर में 154 साल बाद सम्मान मिला।

उम्मीद में बहुत ताकत है, इस एक सफलता ने अमर उजाला को लड़ने का यह हौसला दिया। नतीजा पीपीगंज का मामला है। एक नाबालिग को मां बनाने वाला कुकर्मी पुलिस की पकड़ से बचने को भाग रहा है। दुष्कर्म से जन्में बच्चे को अपने ही हाथों मौत के घाट उतारने वाली नाबालिग मां आज बालिका संरक्षण गृह पहुंच चुकी है। इस घिनौनी वारदात पर पर्दा डालने वाली नाबालिग मां की मां आपराधिक साजिश के आरोप में जेल चली गई।

पीपीगंज में 31 फरवरी को झाड़ियों में जब एक नवजात बच्ची की लाश मिली, उसी वक्त अमर उजाला ने तय कर लिया था कि लड़ाई कितनी भी कठिन हो, अंजाम तक पहुंचाएंगे। पुलिस के शुरुआती रुख से यह लड़ाई बेहद कठिन नजर आई, मगर अमर उजाला टीम ने वन वे पकड़ा था, वापसी का रास्ता बंद करके। इस लड़ाई में गोरखपुर मीडिया का एक ताकतवर हिस्सा भी अमर उजाला का हमसफर नहीं था।

अपनी-अपनी वजहों से वे अपने पाठकों से विश्वासघात करने में संकोच नहीं कर रहे थे। पीपीगंज के इलाके के लोग जानते हैं कि इस कुकृत्य में पुलिस को बौना बनाने वाले कौन हैं? अमर उजाला टीम ने अपनी रणनीति से इन ताकतों को घुटने के बल बैठने पर मजबूर कर दिया। पुलिस को भी कर्त्तव्यबोध हुआ और उसने इतिहास रच दिया।

जब भी गोरखपुर में लावारिस नवजात के बेरहम मां-बाप को दंड दिलाने की बात आएगी, कैंपियरगंज पुलिस टीम का नाम बहुत आदर से लिया जाएगा। हां.. आज हम बहुत राहत महसूस कर रहे हैं, मगर यह राहत अगली लड़ाई लड़ने के लिए ताकत बटोरने की है, आराम करने के लिए नहीं। यह लड़ाई जारी रहेगी.....संपादक
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