यह चिंगारी 24 सितंबर 2019 की है जो 31 जनवरी 2020 को झाड़ियों में एक नवजात बच्ची की लाश मिलने पर भड़क कर शोला बन गई। बच्ची को जन्म के बाद पटक-पटककर मौत के घाट उतार दिया गया था। क्या हुआ था, 24 सितंबर को? गोरखपुर जंक्शन पर कपड़े में लिपटा एक लावारिस नवजात मिला। जीआरपी का रवैया इंतहा की हद तक असंवेदनशील। जैसे कोई लाश मिली हो, रोजनामचे पर अंकित किया, कृपा इतनी की कि पोस्टमार्टम के लिए नहीं भेजा, चाइल्ड लाइन भेज दिया।
यह सब तब जब, एकदम स्पष्ट कानून है, यदि कोई अभिभावक 12 साल से कम उम्र के बच्चे की जान जोखिम में डालते हुए असुरक्षित छोड़ता है तो उसके खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 317 के तहत और यदि पैदाइश छिपाने के लिए कोई नवजात को मृत या जीवित फेंकता है तो धारा 318 के तहत कार्रवाई हो सकेगी। सवाल है, आखिर कार्रवाई होगी कब? जब मुकदमा दर्ज होगा न।
गोरखपुर में मासूम बच्चों के हित संरक्षण के इस कानून के तहत मुकदमा दर्ज करना तो पुलिस की अकर्मण्यता की भेंट चढ़ गया था। बहाना, वादी नहीं किसकी तहरीर पर मुकदमा दर्ज करें। संज्ञेय अपराध सात साल तक की सजा, कमाल है, इसमें भी पुलिस वादी तलाश रही है।
बहरहाल, अमर उजाला ने 24 सितंबर 2019 को ही ठान लिया कि उस हर लावारिस नवजात की कानूनी लड़ाई वह लड़ेगा, जिसे उसे मां-बाप ने चाहे लिंग भेद के लिए, चाहे अपने अनैतिक कृत्यों को छुपाने के लिए सड़कों, गलियों, नदी-नालों, झाडियों में फेंक दिया हो।
मकसद साफ है कि अगर ऐसे बेरहम माता-पिता की पहचान कर, उनके खिलाफ प्रभावी कानूनी कार्रवाई हो सकी तो ऐसा करने से पहले वे लाख बार सोचेंगे और अगर इस प्रयास में एक भी नवजात सड़क पर फेंके जाने से बच गया तो हमारी मुहिम सार्थक हो जाएगी। अमर उजाला के संकल्प को तत्कालीन डीजीपी ओम प्रकाश सिंह का समर्थन मिला, उन्होंने आदेश जारी किए कि धारा 317-318 आईपीसी के तहत मुकदमे दर्ज करके कार्रवाई हो।