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पूर्वोत्तर रेलवे के ठेके में पहले चलती थीं गोलियां, अब 'माउस' ने बदला माहौल, पढ़ें दिलचस्प किस्से

Mon, 16 Mar 2020 05:29 PM IST
vivek shukla राजन राय, गोरखपुर।

सार

  • पूर्वोत्तर रेलवे के ठेकों को लेकर कई लोगों की हुई है हत्या
  • रेलवे के ठेके को लेकर पूर्वांचल में फैला था माफियाराज
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NER - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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पूर्वोत्तर रेलवे का निर्माण संगठन और उप मुख्य चीफ इंजीनियर का दफ्तर। एक कमरे में बैठे एक अधिकारी और उनका बाबू। न किसी तरह का शोर शराबा और न ही भीड़-भाड़। ठेकेदारों के सामने आने की जरूरत भी नहीं। किसने कितने रेट डाले, सब कुछ ठेके देने के लिए जिम्मेदार अधिकारियों के कंप्यूटर के स्क्रीन पर सामने।

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इसी तरह पूर्वोत्तर रेलवे के अधिकार क्षेत्र के अलग-अलग ऑफिसों में बैठे विभिन्न ठेकों से जुड़े अधिकारी कंप्यूटर पर माउस क्लिक करते हैं और साल भर में 3000 करोड़ रुपए से अधिक के टेंडर फाइनल हो जाते हैं। लेकिन, कुछ साल  पीछे पलट कर देखते हैं तो ऐसा माहौल नहीं था। जगहें यही होती थीं, पर आज के  शांत दृश्य के एकदम विपरीत चारों ओर अशांति रहती थी।

पूर्वोत्तर रेलवे के निर्माण संगठन का नजारा तो  कुछ ज्यादा ही विस्फोटक रहता था। जगह-जगह पुलिस की घेरेबंदी। अपहरण की घटनाएं। बंदूकें  गरजती थीं और लाशें बिछतीं थीं। रेलवे के ठेके पर कब्जे के लिए बाहुबल का किस कदर इस्तेमाल होता था, आज भी इन दफ्तरों की दीवारें इस बात की गवाही देती हैं। इन दीवारों ने सब कुछ देखा-सुना है। गोलियों से जख्मी भी हुईं।

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पूर्वांचल में फैला था माफियाराज

NER - फोटो : अमर उजाला
पूर्वोत्तर रेलवे के इन्हीं ठेकों के चलते पूर्वांचल में माफियाराज फैला था, लेकिन तकनीकी युग में ऐसा बदलाव आया कि चार दशक से चला आ रहा माफियाओं का साम्राज्य नेस्तनाबूद हो गया। पूर्वोत्तर रेलवे में 2016 से ई-टेंडिरिंग शुरू हुई और 2017 में सभी ठेके ऑनलाइन हुए तो बाहुबली गायब होते चले गए। उनकी जगह बड़ी-बड़ी कॉरपोरेट फर्मों ने ले लिया। नतीजा रेलवे के ठेकों में चार दशक से चला आ रहा खूनी खेल का खात्मा हो गया। अब यहां धांय-धांय की आवाज नहीं  गूंजती, चलता है तो सिर्फ माउस।

आठ साल पहले दफ्तर में हुई अंतिम हत्या
10 फरवरी 2012 को पूर्वोत्तर रेलवे के उप मुख्य इंजीनियर, गोरखपुर क्षेत्र के दफ्तर में टेंडर पड़ने वाला था। सुबह से ही चहल-पहल बढ़ गई थी। बवाल की भनक अफसरों को भी लग गई थी। लिहाजा, आरपीएफ और पुलिस बुला ली गई। इसी बीच कुछ लोग 22 वर्ष के छरहरे बदन वाले विकास सिंह श्रीनेत को रोकने लगे। पहले समझाने की कोशिश हुई, धक्कामुक्की के बीच विकास नहीं माना।

टेंडर फार्म लिए परिसर में दाखिल हो गया। तभी गोलियां चलने लगीं। धांय-धांय की आवाज से भगदड़ मच गई। खून से लथपथ विकास गिर पड़े और अस्पताल में डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। विकास रेलवे के ठेकेदार उमा सिंह के सहयोगी थे। हत्या में आरोपी बने नया गांव के बृजेश सिंह। इस वारदात से रेल महकमा दहल गया। इसकी गूंज दिल्ली तक सुनाई दी। फिर क्या था, ठेके में खूनखराबा रोकने को लेकर मंथन शुरू हो गया।

श्रीप्रकाश वसूलता था गुंडा टैक्स

NER - फोटो : अमर उजाला
ठेका डालने के विवाद में विकास की हत्या में आरोपित बृजेश सिंह बताते हैं कि रेलवे में ठेके को लेकर एक बात चलती थी, जिसका पौव्वा जितना भारी, ठेका भी उतना ज्यादा। लेकिन, कुख्यात माफिया श्रीप्रकाश शुक्ला के दखल के बाद यह ट्रेंड बदल गया। श्रीप्रकाश का खौफ इतना ज्यादा था कि वह ठेकेदारों से गुंडा टैक्स वसूलने लगा और लोग बिना किसी को बताए यह टैक्स देने भी लगे।

श्रीप्रकाश के बाद माफिया बृजेश सिंह भी गुंडा टैक्स लेने लगे। वाराणसी मंडल के कार्यों में बिना बृजेश से सांठगांठ किए ठेका लेना आसान नहीं था। अब तो किसी को किसी का डर नहीं। ई-टेंडरिंग ने रेलवे में दबंगई खत्म कर दी। किसने, कितना टेंडर डाला है सभी लोग देख सकते हैं। इस व्यवस्था से ठेकेदारों को बहुत सहूलियत हुई है।

जब रेलवे के ठेके में 22 वर्ष के पेशेवर शूटर बन चुके श्रीप्रकाश शुक्ला ने एंट्री मारी थी और उसे शह मिली थी, मोकामा, बिहार के माफिया सूरजभान ‘दादा’ का। श्रीप्रकाश और ‘दादा’ की जोड़ी ने बाहुबली वीरेंद्र प्रताप शाही और बाहुबली हरिशंकर तिवारी के  साम्राज्य को काफी चोट पहुंचाई।

श्रीप्रकाश के नाम से बड़े-बड़े सूरमा अंडरग्राउंड हो गए या खुद को रेलवे ठेके से दूर कर लिया। हत्या, अपहरण, फिरौती आम बात हो गई। यह समय रेलवे अफसरों के लिए कठिन था। श्रीप्रकाश का दौर करीब चार सालों तक चला। श्रीप्रकाश के एनकाउंटर के बाद भी खूनी खेल का सिलसिला थमा नहीं। बंदूक की नाल के दम पर ठेके हथियाने का सिलसिला बदस्तूर जारी रहा।

कुख्यात अशोक सम्राट व चंदेश्वर सिंह की एंट्री से शुरू हुआ था गैंगवार

रेलवे में ठेके के लिए बिहार सबसे मुफीद था। वजह यह थी कि बिहार में रेलवे का विस्तार तेजी से हो रहा था। नई लाइनें और पुल बनाए जा रहे थे। रेलवे ठेके से जुड़े एक अफसर के मुताबिक  1985-86 में अपराध जगत से जुड़े लोग ठेके में कूदे।

कुख्यात अपराधी अशोक सम्राट ने एंट्री मारी और अपने रुतबे से बड़ा ठेका हथिया लिया। इसके बाद ठेके के इस खेल में मुजफ्फरपुर के चंदेश्वर सिंह भी आ गए। ठेके को लेकर अशोक सम्राट से उनकी ठन गयी थी।

कई बार दोनों तरफ से गोलियां चलीं। चंदेश्वर की हत्या उनके बेटे की शादी से पहले तिलक के दिन उनके दरवाजे पर ही कर दी गई। बिहार में पहली बार एके 47 का इस्तेमाल इस हत्या के लिए किया गया था। प्रतिशोध में अपराधी मिनी सरकार की हत्या लंगट सिंह कॉलेज के हॉस्टल में 1989 में सरस्वती पूजा के दिन बम मारकर कर दी गई।

1995 में अशोक सम्राट भी पुलिस एनकाउंटर में मारा गया। इसी दौर में बाहुबली हरिशंकर तिवारी और वीरेंद्र प्रताप सिंह ने भी ठेकों में दखल दी। ठेके के खूनी जंग में देवेंद्र दुबे, बृजबिहारी प्रसाद, ओंकार सिंह, छोटन शुक्ला सहित न जाने कितने किरदार उभरे। गैंगवार बढ़ता गया और लाशें बिछती गईं।
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ई-टेंडरिंग की प्रक्रिया

रेलवे में ई-टेंडरिंग के लिए रजिस्ट्रेशन कराना होगा। जो ई-मेल एकाउंट देंगे, वही आईडी होगी। विभाग रजिस्ट्रेशन के बाद एक पासवर्ड जारी करेगा, जो बाद में बदला जा सकता है। इसी आईडी और पासवर्ड खोलकर रेलवे की साइट पर टेंडर भरना होता है। इस टेंडर को विभाग के अधिकारी अपने पासवर्ड से सबके सामने खोलते हैं। सबसे कम रेट डालने वाले टेंडर को कंप्यूटर स्वत: उठा कर ऊपर कर देता है। इससे जहां रेलवे के ठेके में खून-खराबा रुका, वहीं ठेके का रेट भी कम हो गया। बहुत सारी बड़ी कंपनियां टेंडर भरने लगीं क्योंकि यह किसी को पता नहीं चलता है कि किसने टेंडर डाला है।

मैंने बदलता दौर देखा है
एनई  रेलवे मजदूर यूनियन महामंत्री केएल गुप्त ने कहा कि 104 वर्ष की उम्र हो गई है। पूर्वोत्तर रेलवे का गठन मेरे सामने ही हुआ। मैंने रेलवे के ठेके को बड़ी नजदीकी से देखा है। गैंगवार की घटनाएं देखीं हैं। चार दशक तक ठेके को लेकर अपहरण, हत्याएं आम बात थीं। जहां टेंडर खुलते थे, उधर जाने से डर लगता था। हर तरफ गुंडे होते थे।

बड़ी-बड़ी गाड़ियों में असलहों के साथ बैठे लोग थे। पूर्वांचल से लेकर बिहार तक रेलवे का ठेका वही पाता था, जिस पर माफियाओं का हाथ होता था। जब से ई-टेंडरिंग शुरू हुई, तब से पूरा माहौल ही बदल गया। अब तो पता ही नहीं चलता कि टेंडर पड़ रहे हैं।

ई-टेंडरिंग से बढ़ी है पारदर्शिता
एनईआर, सीपीआरओ पंकज कुमार सिंह ने कहा कि ई-टेंडरिंग से ठेके में पारदर्शिता बढ़ी है। अब कहीं भी बैठकर टेंडर अपलोड किया जा सकता है। दफ्तर आने की भी जरूरत नहीं है। भ्रष्टाचार पर रोक लगी है।  पेपर की बर्बादी रुकी और समय की बचत हुई है। टेंडर की प्रक्रिया कम समय में पूरी हो जाती है। गड़बड़ी की गुंजाइश काफी कम हो गई है। 
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