रिंग रोड के निर्माण के लिए सहमति के आधार पर जमीन अधिगृहीत करने के लिए जा रही एसएलओ (भूमि अध्याप्ति अधिकारी) और एनएचएआई के अधिकारियों, कर्मचारियों को हर जगह विरोध झेलना पड़ रहा है। कहीं भी किसान जमीन देने को तैयार नहीं हैं। शुक्रवार को बनकटी उर्फ इटहिया गांव पहुंची टीम को किसानों का गुस्सा झेलना पड़ा। किसानों ने मौजूदा दर पर प्रस्तावित मुआवजे को बाजार दर से काफी कम बताते हुए सहमति पत्र पर दस्तखत करने से मना कर दिया। ग्रामीणों का आक्रोश बढ़ता देख टीम आधे घंटे में ही वहां से निकल गई। किसानों ने बताया कि टीम को हमले का डर था।
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किसानों की शिकायत थी कि सात साल पहले 2016 के सर्किल रेट के मुताबिक मुआवजा दिया जा रहा है, जो बहुत कम है। इस दर पर अपनी जमीन नहीं देंगे। टीम को बृहस्पतिवार को सरैया पंचायत भवन पर भी इसी तरह का विरोध झेलना पड़ा था। दोनों विभागों के अधिकारियों-कर्मचारियों ने वहां तीन पंचायतों परसिया, रसूलपुर और सोनराइच के किसानों को बुलाया था। मगर, वहां के किसानों ने भी मुआवजे की मौजूदा प्रस्तावित दर पर जमीन देने से इनकार कर दिया था, जिसके बाद टीम को खाली हाथ लौटना पड़ा।
पांच लाख रुपये प्रति डिस्मिल या जमीन के बदले दिलाइए जमीन
गांव के हरीराम ने कर्मचारियों से कहा कि यहां चार से पांच लाख रुपये प्रति डिस्मिल भूमि बिक रही है। आप लोग महज 68 हजार देना चाहते हैं। 2016 के सर्किल रेट पर हम लोग कतई अपनी जमीन नहीं देंगे। एनएचएआई के सर्वेयर चंद्रशेखर ने कहा कि हम लोग मुआवजा आवेदन की प्रक्रिया समझाने और सहमति पत्र भरवाने आए हैं। अधिक कीमत की बात आप लोग डीएम और सीडीओ से कीजिए। इतना सुनते ही ग्रामीण और आक्रोशित हो गए और हंगामा शुरू कर दिया। उन्होंने सहमति पत्र भरने से मना कर दिया।
हर जमीन के बदले दे दें जमीन
इश्तियाक अहमद ने कहा कि मुआवजा न दें, जमीन के बदले जमीन ही दे दें। कल सरैया में विरोध हुआ था। आज हमारे गांव इटहिया के लोगों ने भी व्यवस्था को अपना फैसला सुना दिया। इस दर पर हम जमीन नहीं देंगे।
चार से पांच लाख रुपये प्रति डिस्मिल है रेट
प्रधान गुलाब चंद ने कहा कि चार से पांच लाख रुपये प्रति डिस्मिल भूमि बिक रही है। सरकार के भुगतान का हिसाब किताब 68 हजार रुपये प्रति डिस्मिल पड़ रहा है। ऐसे में हम लोग अपनी भूमि कैसे दे सकते हैं।
खेत की जमीन निकल जाएगी तो खाएंगे क्या
हरीराम जायसवाल ने कहा कि हम लोगों की पुस्तैनी भूमि है। खेत की जमीन निकल जाएगी तो क्या खाएंगे। जो पैसा मिलेगा, उससे आसपास भूमि नहीं खरीद पाएंगे। यहां मेन रोड के किनारे प्रति डिस्मिल 10 लाख रुपये से अधिक कीमत है।
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परिवार चलाना मुश्किल होगा
रामकृपाल ने कहा कि किसी का मकान जाएगा तो किसी की जमीन निकल जाएगी। जो मुआवजा मिलेगा, उससे परिवार चलाना मुश्किल होगा। इस दर में संशोधन करना चाहिए।
प्रस्तावित दर और बाजार दर में बड़ा अंतर
धर्मेंद्र गुप्ता ने कहा कि हमारी जमीन औने-पौने दाम पर लेने का क्या मतलब है। कर्मचारी कह रहे हैं कि आप लोग अधिकारियों से बात कीजिए। हमारे पास जो आएगा, उसी से तो बात की जाएगी। विभाग द्वारा प्रस्तावित दर और बाजार दर में बड़ा अंतर है।
राम बहादुर ने कहा कि प्रशासन के पास दो विकल्प हैं। या तो काश्तकारों को दी जाने वाली रकम बढ़ाएं या फिर जिसकी जितनी जमीन ले रहे हैं, उनको उतनी ही जमीन देकर मामला सुलटाएं। तभी सहमति पत्र भरा जाएगा।
वन विभाग की एनओसी 15 दिन में
एनएचएआई के परियोजना प्रबंधक भवेश अग्रवाल ने बताया कि वन विभाग से एनओसी के लिए आवेदन कर दिया गया है। उसकी प्रक्रिया चल रही है। उम्मीद है 15 दिन में एनओसी मिल जाएगी। जमीन अधिग्रहण की भी कार्रवाई चल रही है। 26 गांव के किसानों से जमीन ली जानी है। उनसे संवाद चल रहा है। किसान मुआवजा लेने को तैयार नहीं हैं। फिलहाल विभाग के पास कोई जमीन नही है। दिक्कत होगी तो प्रशासन से सहायता ली जाएगी।
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डीएफओ विकास यादव ने कहा कि एनएचएआई ने अभी तक आपत्ति का निस्तारण नहीं भेजा है। केंद्र सरकार की फर्म क्रेडिट एडिमिनिस्ट्रेशन ( एफसीए) की तरफ से एनओसी दी जाएगी। एफसीए ने आपत्ति लगाकर एनएचएआई को आवेदन वापस भेज दिया था। कृषि या वन विभाग की भूमि अधिग्रहण के लिए केंद्र सरकार की एफसीए से अनुमति लेना अनिवार्य होता है।