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Gorakhpur News: महाविद्यालय के छात्र भी ले सकेंगे नेट कोचिंग, एक से चलेंगी कक्षाएं

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पीएम उषा योजना से एक दिसंबर से चलेंगी नेट/जेआरएफ की कक्षाएं
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विभागीय स्तर पर ही चलेंगी कक्षाएं, विभागाध्यक्ष चुनेंगे मेधावी छात्र
संवाद न्यूज एजेंसी
गोरखपुर। दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय में मेधावी विद्यार्थियों के लिए नेट और जेआरएफ की तैयारियों के लिए कक्षाएं एक दिसंबर से शुरू हो जाएंगी। परास्नातक, पीजी डिप्लोमा और पीएचडी कर रहे विद्यार्थियों को तैयारी कराई जाएगी। महाविद्यालय के शोधार्थी भी इसका लाभ उठा सकेंगे। नेट की कोचिंग के लिए वही शिक्षक अर्ह होंगे, जो खुद नेट क्वालीफाइड होंगे।

प्रधानमंत्री उच्चतर शिक्षा अभियान (पीएम-उषा) के अंतर्गत गोरखपुर विश्वविद्यालय को अपने विद्यार्थियों को नेट और जेआरएफ की तैयारी के लिए 32 लाख रुपये मिलने हैं। इसकी पहली किस्त के रूप में 19 लाख रुपये जारी कर दिए गए हैं। विश्वविद्यालय प्रशासन ने इसकी कक्षाएं विभागों में ही चलाने का निर्णय लिया है। सभी विभागाध्यक्षों को विभागीय शिक्षकों की मदद से परास्नातक के मेधावी छात्रों को चयनित करने की जिम्मेदारी दी गई है।
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सभी विभागाध्यक्षों से नेट की कोचिंग के लिए कक्षाओं की समय-सारणी, शिक्षकों के नाम तथा विद्यार्थियों की संख्या की जानकारी मांगी गई है। जो विद्यार्थी ये कक्षाएं करना चाहते हैं, उनके लिए गूगल फॉर्म जारी किया गया है। इस संबंध में कुलपति प्रो. पूनम टंडन ने विभागाध्यक्षों की बैठक कर उन्हें जरूरी दिशा-निर्देश दिए हैं।
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नेट क्वालीफाइड शोधार्थियों को मिलेगा अध्यापन का मौका
नेट की तैयारी कराने के लिए शिक्षकों के साथ ही नेट क्वालीफाइड शोधार्थियों को भी मौका मिल सकता है। डीडीयू प्रशासन का मानना है कि जो शोधार्थी नेट क्वालीफाइड हैं, वे मददगार साबित होंगे। इससे उनमें टीचिंग स्किल डेवलप होने के साथ ही प्रति लेक्चर के हिसाब से मानदेय भी मिलेगा।

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10 लाख की खरीदी जाएंगी ई-बुक्स
नेट और जेआरएफ की तैयारी करने में सहायक करीब 10 लाख रुपये की ई-बुक्स भी खरीदी जाएंगी। विभागवार होने वाली इन कक्षाओं की सफलता से विभाग की प्रतिष्ठा बढ़ेगी। जितनी बड़ी संख्या में विद्यार्थी नेट या जेआरएफ में सफल होंगे, विभाग का उतना ही नाम होगा।
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वर्जन
नेट और जेआरएफ की तैयारी के लिए अलग से कक्षाएं चलाना विश्वविद्यालय के छात्रों के लिए बड़ी सौगात है। इससे छात्रों को तैयारी करने के लिए बाहर लगने वाली मोटी फीस बचेगी। अपने ही विभाग में कक्षाएं चलने से इधर-उधर भागदौड़ भी नहीं करनी होगी।
प्रो. पूनम टंडन, कुलपति, गोविवि
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