फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

नशीली दवा: असली की आड़ में डुप्लीकेट दवा बेच रहे धंधेबाज- गोरखपुर का भालोटिया मार्केट सुरक्षित 'अड्डा'

Wed, 12 Jun 2024 10:24 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर

सार

धंधेबाजों ने हिमाचल और उत्तराखंड की कुछ कंपनियों से सेटिंग कर ब्रांडेड कंपनियों के नाम से मिलते-जुलते नाम वाला इंजेक्शन व टैबलेट बनवा लिया है। सूत्र बताते हैं कि इसमें रैपर से लेकर साल्ट तक सब कुछ एक जैसा होता है। बस साल्ट की मात्रा थोड़ी कम होती है और ब्रांड नाम में स्पेलिंग मिस्टेक होता है, जिसे सामान्य आदमी पहली नजर में पकड़ नहीं सकता। धंधेबाजों का फायदा यह होता है कि ब्रांड की आड़ में यह माल आसानी से बिक जाता है।
विज्ञापन
भालोटिया मार्केट( सांकेतिक) - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

नशीली दवा के धंधेबाज नियम-कानूनों को ठेंगा दिखाकर लोगों की सेहत के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। वे ब्रांडेड कंपनियों की दवा के नाम में हेरफेर कर डुप्लीकेट माल बाजार में खपाकर मोटा मुनाफा कमा रहे हैं। ऑपरेशन या मानसिक रोगियों के उपचार के लिए बनी दवा और इंजेक्शन की बिक्री के लिए डॉक्टर का पर्चा साथ होना अनिवार्य है।

विज्ञापन


अगर दवा थोक के भाव खरीद रहे हैं तो जिस डॉक्टर ने सप्लाई ऑर्डर दिया है, उसके ही सिग्नेचर का चेक जरूरी है, लेकिन नारकोटिक्स श्रेणी में चिह्नित तमाम दवाएं व इंजेक्शन बिना इन मानकों को पूरा किए ही बिक रही हैं। महराजगंज में पकड़े गए माल के खरीदार धंधेबाजों ने भी इसे बिना किसी जरूरी औपचारिकता के ही खरीदा था।

बाजार से जुड़े सूत्र बताते हैं कि ये पूरा धंधा ही असली की आड़ में चल रहा है। धंधेबाज असली ब्रांडेड कंपनी के नाम से मिलती-जुलती दवा व इंजेक्शन तैयार कराते हैं और उसे बिना किसी औपचारिकता के बेच देते हैं।
विज्ञापन


महराजगंज जिले में एसएसबी और स्थानीय पुलिस की संयुक्त कार्रवाई के दौरान रविवार रात में करीब दो हजार इंजेक्शन पकड़े गए थे। चर्चा है कि ये इंजेक्शन भालोटिया मार्केट से ही खरीदे गए थे। इसके बाद से ही भालोटिया के दुकानदारों में भी इस बात को लेकर तरह-तरह की चर्चा है। पिछले महीने ही बिहार के पटना शहर में भी गोरखपुर का माल पकड़ा गया था।

दवा कारोबार से जुड़े लोग बताते हैं कि नारकोटिक्स श्रेणी में जिन भी दवाइयों को शामिल किया गया है, उनकी बिक्री के लिए अलग से लाइसेंस लिया जाता है। नारकोटिक्स की इन दवाइयों को खरीदने के लिए पंजीकृत डॉक्टर के पर्चे के साथ उन्हीं के सिग्नेचर युक्त चेक की जरूरत होती है, ताकि अगर कहीं दवा के दुरुपयोग की शिकायत हो तो इस बात की जांच की जा सके कि संबंधित दवा या इंजेक्शन किसके कहने पर किस उपयोग के लिए खरीदा गया।

इससे बचने के लिए धंधेबाजों ने दूसरा रास्ता यह खोज लिया कि वे इन दवाओं को बिना लिखा-पढ़ी के ही सीधे धंधेबाजों को बेच देते हैं।

मिलता-जुलता नहीं, साल्ट भी वही
धंधेबाजों ने हिमाचल और उत्तराखंड की कुछ कंपनियों से सेटिंग कर ब्रांडेड कंपनियों के नाम से मिलते-जुलते नाम वाला इंजेक्शन व टैबलेट बनवा लिया है। सूत्र बताते हैं कि इसमें रैपर से लेकर साल्ट तक सब कुछ एक जैसा होता है। बस साल्ट की मात्रा थोड़ी कम होती है और ब्रांड नाम में स्पेलिंग मिस्टेक होता है, जिसे सामान्य आदमी पहली नजर में पकड़ नहीं सकता। धंधेबाजों का फायदा यह होता है कि ब्रांड की आड़ में यह माल आसानी से बिक जाता है।

चूंकि वे इसे बिना लाइसेंस व सरकारी शुल्क जमा कराए ही बनवाते हैं, इसलिए टैक्स से लेकर विज्ञापन तक में होने वाला खर्च भी बच जाता है। जब ये दवाएं पकड़ी जाती हैं तो साल्ट की मौजूदगी के कारण ये नकली नहीं, बल्कि अधोमानक की श्रेणी में आती हैं।

अगर हंगामा हुआ तब ब्रांडेड कंपनी की तरफ से कॉपीराइट एक्ट के तहत केस कराया जाता है, जिसके बाद इस नाम को बंद कर दूसरा नाम प्रयोग में आ जाता है।

असिस्टेंट कमिश्नर ड्रग एजाज अहमद ने बताया कि जल्द ही दवा की दुकानों की जांच के लिए कमेटी बनाई जाएगी। पूर्व में मिली शिकायतों पर जांच कराकर कार्रवाई की गई है।
 

विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें