गोरखपुर। नामी डॉक्टर और सभी प्रकार की जांच एक ही छत के नीचे जैसी लुभावनी सुविधा का झांसा देकर ही दलाल बीआरडी मेडिकल कॉलेज और जिला अस्पताल से मरीजों को निजी अस्पताल ले जा हे हैं। वहां इलाज के नाम पर मोटी रकम वसूल करने के बाद मरीज को दूसरे अस्पताल ले जाने की सलाह दे दी जा रही है। इनके चक्कर में फंसे लोग इलाज कराने में कर्जदार हो गए, लेकिन मरीज की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ। अस्पताल और डॉक्टर का पंजीकरण होने के चलते ऐसे मामलों पर शिकायतों पर भी कोई कार्रवाई नहीं होती।
गोरखपुर शहर पूर्वांचल ही नहीं पड़ोसी बिहार और नेपाल के तराई इलाकों के लिए भी चिकित्सा का सबसे बड़ा केंद्र बनकर उभरा है। यहां हर दिन करीब 10 हजार मरीज केवल सरकारी अस्पतालों में इलाज के लिए पहुंचते हैं। लगभग इतने ही मरीज विभिन्न निजी अस्पतालों में भी आते रहते हैं। इसके चलते तेजी से नए-नए अस्पताल खुल रहे हैं। मेडिकल कॉलेज और उसके आसपास 20 से अधिक छोटे-बड़े निजी अस्पताल खुल गए हैं।
बेतियाहाता तो मेडिकल का हब है ही, अब देवरिया बाईपास मोड़ के पास तारामंडल इलाके में भी लाइन से अस्पताल खुले हैं। भीड़ में यह पहचान कर पाना मुश्किल है कि इनमें से कौन पंजीकृत या अपंजीकृत है। बोर्ड पर बड़े डॉक्टरों का नाम पढ़कर मरीज अंदर जाते हैं। इन्हीं बड़े अस्पतालों की आड़ में जगह-जगह अवैध अस्पतालों का भी संचालन होता है। खुलासा तब होता है, जब इलाज में लापरवाही के चलते किसी की जान चली जाती है या फिर रुपये नहीं होने पर मरीज को ही बंधक बना लिया जाता है।
केस 1 कुशीनगर के जयप्रकाश बोदरवार के पास सड़क हादसे में गंभीर रूप से घायल हो गए। घरवाले बीआरडी मेडिकल कॉलेज लेकर पहुंचे तो डॉक्टर ने आईसीयू में भर्ती कराने को कहा, लेकिन उसमें जगह नहीं थी। करीब छह घंटे तक वहां रहने के बाद परिजन वहां से कुछ दूर स्थित एक बड़े निजी अस्पताल लेकर गए। वहां आईसीयू का एक दिन का खर्च ही करीब 45 हजार रुपये आ रहा था। आठ दिन में पांच लाख रुपये का बिल भरने के बाद परिजनों ने रुपये नहीं होने की बात कही तो अस्पताल ने किसी दूसरी जगह ले जाने की सलाह के साथ मरीज को डिस्चार्ज कर दिया। शहर के ही एक अन्य अस्पताल में अभी भी मरीज का इलाज हो रहा है।
केस-2 नौसड़ क्षेत्र की एक युवती नजदीक के एक निजी अस्पताल में बुखार का इलाज कराने गई थी। वहां इंजेक्शन लगने के बाद उसकी हालत बिगड़ गई। युवती को फालिज का अटैक हो गया। इलाज के बाद हालत में सुधार होने पर इसकी शिकायत सीएमओ कार्यालय में हुई। जांच हुई तो अस्पताल और डॉक्टर का पंजीकरण सही पाया गया। इस वजह से कोई कार्रवाई नहीं हुई। हालांकि, इस मामले में एफआईआर तक दर्ज कराई गई थी।
केस-3
जिला अस्पताल के पास संचालित एक अस्पताल में एक युवती अपने कान की प्लास्टिक सर्जरी कराने गई थी। किसी दलाल ने उससे 35 हजार रुपये ऐंठ लिए। इलाज के बाद युवती डॉक्टर से मिली और प्लास्टिक सर्जरी की जगह नार्मल सर्जरी की बात कही। इसके बाद पता लगा कि उसकी प्लास्टिक सर्जरी तो हुई ही नहीं थी। युवती ने सीएमओ दफ्तर में शिकायत की तो बताया गया कि अस्पताल और डॉक्टर का पंजीकरण है, इसलिए इस मामले में और कोई कार्रवाई नहीं बनती है।
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केस-4 मोहद्दीपुर स्थित एक निजी अस्पताल में बवासीर का ऑपरेशन कराए मरीज का घाव महीने भर बाद भी ठीक नहीं हुआ तो परिजन शिकायत लेकर आए। डॉक्टर ने दोबारा ऑपरेशन की बात कही। तब तक हालत बिगड़ी तो उन्हें पीजीआई लेकर जाने की सलाह दी गई। वहां जाने पर पता लगा कि इस मरीज को कैंसर है। घाव इतना बढ़ चुका है कि अब इसमें सुधार की कोई गुंजाइश नहीं है। इलाज कराने के बाद परिजन करीब चार महीने बाद शिकायत लेकर अस्पताल पहुंचे तो डॉक्टर ने डांटकर भगा दिया।
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कोट-
सरकारी अस्पतालों में हर तरह के इलाज की सुविधा है। जो अस्पताल स्वास्थ्य विभाग में पंजीकृत हैं, वहां भी अगर इलाज में लापरवाही की शिकायत मिलती है तो जांच कराई जाती है। हाल में जिन दो अस्पतालों में लापरवाही मामले सामने आए हैं, उनकी जांच की जा रही है। एक महीने में सात-आठ अस्पतालों पर छापा मारा जा चुका है। ग्रामीण इलाके में सभी सीएचसी-पीएचसी अधीक्षकों, डिप्टी सीएमओ को निर्देश दिया गया है कि जहां कहीं से अवैध अस्पताल संचालन की सूचना मिले तो उसकी तत्काल जांच करें और ऐसे मामलों में कार्रवाई के साथ-साथ केस भी दर्ज कराएं।
- डॉ. आशुतोष कुमार दूबे, सीएमओ