परिवर्तन ही एक मात्र सास्वत सत्य है। परिवर्तन का रहस्य अपनी सारी ऊर्जा को पुराने से लड़ने पर नहीं, परंतु नए निर्माण पर केंद्रित करना है। व्यावसायिक क्षेत्र में सफलता उन्हीं को प्राप्त होती है जो व्यवसायी वातावरण में होने वाले परिवर्तनों का उचित प्रबंधन करते हुए स्वयं को परिवर्तित कर पाते हैं।
कोई भी संगठन अकेले रह कर कार्य नहीं कर सकता हैं, अपितु उसे वातावरण में होने वाले परिवर्तनों को ध्यान मे रख कर आगे बढ़ना चाहिए। यह परिवर्तन किसी भी क्षेत्र में जैसे कर्मचारियों की बढ़ती अपेक्षाएं, ग्राहकों की बदलती जीवन शैली एवं पसंद, विक्रेताओं की रणनीति, सरकारी नीतियां, प्रतिस्पर्धा की रणनीति एवं तकनीकी सहित विभिन्न क्षेत्रों में हो सकती हैं।
यदि बात करें कर्मचारियों के कॅरियर को लेकर परिवर्तित होती सोच और बढ़ती अपेक्षाओं की एवं संगठनों द्वारा उनकी अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए दिए जा रहे विभिन्न प्रलोभनों की, तो शायद आप यह जानकार चौंक जाएंगे की विवाह एवं परिवार नियोजन जैसे बेहद निजी विषयों में भी संगठनों की दखलंदाजी हैं।
सिलिकॉन वैली में कार्यरत महिला कर्मचारियों के लिए एप्पल एवं फेसबुक जैसी कंपनियों द्वारा एग फ्रीजिंग जैसे खर्चीले ऑफर तक दिए जा रहे हैं, जिससे प्रतिभाशाली महिला कर्मचारियों की सेवा मिलती रहे, जो कि विवाह एवं गर्भधारण के बाद नहीं मिल पाएंगी।
भारतीय बाजार में उपभोक्ताओं के जीवनशैली एवं उत्पादों पर खर्च करने के तरीके में भी बदलाव नजर आ रहा है। नेल्सन के सर्वे के अनुसार महानगरों मे उपभोक्ताओं का एक समूह तीव्र गति से बढ़ रहा है जिसकी आयु 28 से 42 वर्ष के मध्य है। जिनको नाम दिया गया है सुपर कंज्यूमर। ये वो लोग हैं जो विवाहित हैं परंतु इनके पास संतान नहीं हैं। यानि डबल इनकम नो किड्स।
उपभोगताओं का एक वर्ग और उभर रहा है जिसको सिंगल वेल्थी अर्बेनाइट्स कहा जाता है। ये वो उपभोक्ता समूह हैं जो छोटे शहरों से आकर महानगरों मे कार्यरत हैं। जिनके ऊपर पारिवारिक जिम्मेदारी नहीं है। ये लोग प्रीमियम ब्रांड के वस्तुओं को ज्यादा पसंद करते हैं और एक उपभोक्ता के रूप में किसी भी तरह के हो रहे परिवर्तनों को बहुत जल्दी स्वीकार कर लेते हैं।
टूटते संयुक्त परिवार और तेजी से उभरते एकल परिवार ने एक ही परिवार में विभिन्न उत्पादों के उपभोग को काफी बढ़ा दिया है। जिसके कारण कंज्यूमर ड्यूरेबलस हो या कोई अन्य उत्पाद की खपत, एक ही परिवार मे कई गुना बढ़ गई है। अब हर व्यक्ति व्यक्तिगत टेलीविजन, वाहन रखता है और दूसरे से साझा नहीं करना चाहता है। इन परिवर्तनों को भले ही संगठन अवसर के रूप मे देख रहे हों, परंतु सामाजिक व्यवस्था पर इनका विपरीत असर पड़ना तय है। आवश्यकता इस बात की है कि इन परिवर्तनों का कुशल प्रबंधन करते हुए सामंजस्य बिठाकर इनके असर को कैसे कम किया जाए। ‘परिवर्तन है प्रकृति नियम का नियमन कारक। प्रवहमान जीवन प्रवाह का पथ विस्तारक।