पूर्वोत्तर रेलवे में 71 साल पहले आज के ही दिन पहली एसी ट्रेन अवध तिरहुत मेल के नाम से चली थी। छोटी लाइन पर यह ट्रेन गुवाहटी से लखनऊ के बीच गोरखपुर-बस्ती-गोंडा होकर चलती थी। उस दौरान ट्रेन का नंबर भी तीन डिजिट का ही था लेकिन जब ब्रॉड गेज हुआ और ट्रेनों की संख्या बढ़ी तो चार फिर पांच डिजिट का हो गया।
पूर्वोत्तर रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी पंकज कुमार सिंह के संपादन में प्रकाशित पुस्तक 'छोटी लाइन : ए जर्नी ऑफ ट्रांसफार्मेशन' में एसी कोच वाली अवध तिरहुत मेल का जिक्र किया गया है। एक अप्रैल 1955 को अवध तिरहुत मेल (301 अप और 302 डाउन) चलाई गई थी। यात्रियों की सुविधा के लिए ट्रेन में एसी कोच लगाए गए।
यह ट्रेन न केवल अवध (उत्तर प्रदेश) को तिरहुत (बिहार) से जोड़ती थी, बल्कि यह उत्तर बिहार के आर्थिक और सामाजिक विकास की रीढ़ भी रही। हालांकि बड़ी लाइन होने के बाद यह ट्रेन बंद कर दी गई। इसकी जगह 1985 में डिब्रूगढ़ से लालगढ़ के बीच गोरखपुर होकर अवध असम एक्सप्रेस चलाई गई।
ट्रेनों की पहचान व मेंटेनेंस के लिए पड़ा नंबर
हर ट्रेन का एक नंबर होता है लेकिन इसकी शुरुआत की कहानी भी दिलचस्प है। आजादी के पहले तक अलग-अलग क्षेत्रों में रेलवे एजेंट ट्रेनों का संचलन करते थे। पूर्वोत्तर रेलवे को अवध तिरहुत रेलवे के नाम से जाना जाता था। उस समय दूसरे क्षेत्र में जाने पर यह नहीं पता चल पाता था कि जिस श्रेणी की ट्रेन है, उसका मेंटेनेंस कहां होगा।
इसके लिए ट्रेनों पर तीन डिजिट का नंबर डाला गया। 1950 के बाद रेलवे का राष्ट्रीयकरण हुआ। जैसे-जैसे ट्रेनों की संख्या बढ़ती गई ट्रेनों का नंबर चार और फिर डिजिट हो गया है।
पूर्वोत्तर रेलवे के ऐतिहासिक यात्रा पर आधारित बुक 'छोटी लाइन' में एक अध्याय है 'टाइम टेबल-हिस्ट्री ऑफ ट्रेंस'। इसमें कई दिलचस्प जानकारियां हैं। पूर्वोत्तर रेलवे में वातानुकूलित ट्रेन सेवा की शुरुआत एक अप्रैल 1955 को अवध तिरहुत मेल 301 अप/302 डाउन से हुई। क्षेत्रीय रेलों के पुनर्गठन के पूर्व पूर्वोत्तर रेलवे को अवध तिरहुत रेलवे के नाम से जाना जाता था। ट्रेनों का नंबर उस समय तीन डिजिट में था, इसका बदलाव कैसे और क्यों हुआ, इसकी जानकारी भी इस किताब में उपलब्ध है:
पंकज कुमार सिंह, सीपीआरओ-एनईआर