Kittenfishing और Catfishing में क्या फर्क है?
दोनों में सबसे बड़ा फर्क झूठ की सीमा का है। Catfishing में कोई व्यक्ति पूरी तरह नकली पहचान बना सकता है। वह अपनी उम्र, जेंडर, फोटो, नौकरी या पूरी लाइफ स्टोरी तक बदल सकता है और किसी दूसरे व्यक्ति के रूप में सामने आ सकता है। वहीं Kittenfishing में इंसान अपनी असली पहचान नहीं छिपाता। वह बस अपनी कुछ खासियतों को जरूरत से ज्यादा चमकाकर पेश करता है। यानी Catfishing में पूरा मास्क बदल दिया जाता है, जबकि Kittenfishing में असली चेहरे पर थोड़ा ज्यादा फिल्टर लगा दिया जाता है।
आखिर लोग किटनफिशिंग क्यों करते हैं?
डेटिंग विशेषज्ञों के अनुसार, इसका एक बड़ा कारण है, ऑनलाइन डेटिंग की Competition। डेटिंग एप्स के ऑनलाइन मार्केटप्लेस समझें तो पता चलता है कि यहां हर कोई चाहता है कि उसकी प्रोफाइल बाकी लोगों से ज्यादा Attractive लगे। ऐसे में कुछ लोगों को लगता है कि अगर उन्होंने अपनी हाइट, उम्र, नौकरी, पढ़ाई, रुचि या Achievements को थोड़ा बेहतर दिखाया, तो उन्हें ज्यादा Matches मिल सकते हैं। लेकिन इसके पीछे हमेशा कोई बुरी नीयत हो, ऐसा जरूरी नहीं है। कई बार इसकी वजह Insecurity होती है।
सामने मिलने के बाद हो सकती है बड़ी गड़बड़
किसी को लगता है कि वह दूसरे लोगों जितना Attractive नहीं है। कोई अपनी उम्र को लेकर Insecure है, तो कोई कद या करियर को लेकर। उसे लगता है कि अगर सामने वाला पहले ही उसके बारे में कम उम्मीद बनाएगा, तो शायद उसे मौका ही नहीं मिलेगा। यहीं से पहले मैच तो हो जाए, बाद में सब ठीक हो जाएगा वाली सोच शुरू होती है। लेकिन समस्या यहीं है। जब सामने वाला आपसे मिलने आता है और उसे पता चलता है कि प्रोफाइल में बताई गई बातें पूरी तरह सच नहीं थीं, तो उसे लग सकता है कि उसे धोखा दिया गया है। भले ही झूठ छोटा हो, लेकिन विश्वास कमजोर पड़ना शुरू हो जाता है।
फेक इट टिल यू मेक इट वाली सोच भी जिम्मेदार
किटनफिशिंग सिर्फ डेटिंग तक सीमित नहीं है। यह सामाजिक जिंदगी और कामकाज की जगह पर भी दिखाई दे सकता है। खासकर अधेड़ उम्र में, जब लोग करियर बदल रहे हों, नए लोगों से जुड़ रहे हों, नई क्षमताएं सीख रहे हों या खुद को नए सिरे से तैयार कर रहे हों, तब खुद को थोड़ा ज्यादा अनुभवी या सफल दिखाने का आकर्षण बढ़ सकता है।‘फेक इट टिल यू मेक इट’ यानी ‘जब तक कामयाब न हो जाओ, तब तक कामयाब होने जैसा दिखाओ’ या ‘जिस नौकरी को पाना चाहते हो, उसी के हिसाब से खुद को पेश करो’ जैसी बातें कई लोगों को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती हैं। लेकिन कई बार यही सोच खुद को जरूरत से ज्यादा बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने तक पहुंच जाती है। उदाहरण के लिए, किसी ने अभी-अभी एआई के कुछ साधन इस्तेमाल करना शुरू किए हैं, लेकिन अपने पेशेवर परिचय में खुद को ‘एआई विशेषज्ञ’ लिख दिया। किसी ने कुछ ही साल यात्राएं की हैं, लेकिन सोशल मीडिया पर ऐसा दिखाया कि जैसे वह पूरी दुनिया घूम चुका हो। किसी ने किसी संस्था में थोड़े समय के लिए काम किया, लेकिन अपनी प्रोफाइल में उसे बड़ी उपलब्धि की तरह पेश कर दिया।
सोशल मीडिया ने इसे और आसान बना दिया
आज सोशल मीडिया खुद को दूसरों के सामने पेश करने का आसान और फ्री माध्यम है। लोग अपनी जिंदगी का वही हिस्सा दिखाते हैं जो सबसे अच्छा लगता हैअच्छी तस्वीरें, यात्राएं, उपलब्धियां, करियर की सफलता और रोमांचक अनुभव। धीरे-धीरे यह आदत सिर्फ सोशल मीडिया तक सीमित नहीं रहती। लोग अपनी ऑनलाइन छवि को इतना सजा-संवारकर पेश करने लगते हैं कि असली जिंदगी और ऑनलाइन छवि के बीच अंतर बढ़ने लगता है।