नींद को बेहतर बनाने की कोशिश अब सिर्फ जल्दी सोने तक सीमित नहीं रही। Gen Z इसे ट्रैक करने से लेकर अलग-अलग गैजेट्स और सप्लीमेंट्स आजमा रहे हैं, लेकिन क्या नींद को परफेक्ट बनाने की यही कोशिश कहीं नई परेशानी की वजह तो नहीं बन रही? आइए जानते हैं इस ट्रेंड के बारे में।
कभी देर रात तक जागना मेहनत और काम के प्रति लगन की निशानी माना जाता था, लेकिन अब Gen Z के बीच अच्छी नींद को लेकर सोच बदल रही है। कितने घंटे सोए, नींद कितनी गहरी रही और सुबह उठने के बाद शरीर कितना तरोताजा महसूस कर रहा है, लोग इन चीजों पर भी ध्यान देने लगे हैं। सोशल मीडिया पर इसी बढ़ते चलन को Sleepmaxxing कहा जा रहा है।
Sleepmaxxing का मतलब है नींद को ज्यादा से ज्यादा बेहतर बनाने की कोशिश। सोशल मीडिया ने इसे एक वेलनेस ट्रेंड में बदल दिया है, जहां लोग अपनी नींद को ट्रैक और ऑप्टिमाइज करने के लिए अलग-अलग तरीके अपना रहे हैं। मैग्नीशियम सप्लीमेंट, माउथ टेप, स्मार्ट रिंग, रेड लाइट थेरेपी, कूलिंग पैड और स्लीप मास्क जैसे प्रोडक्ट्स अब इस ट्रेंड का हिस्सा बन गए हैं।
Gen Z और Millennials के बीच बर्नआउट और लगातार काम करने वाली लाइफस्टाइल ने रिकवरी और सेल्फ केयर को ज्यादा अहम बना दिया है। ऐसे में अच्छी नींद को लेकर जागरुकता बढ़ना स्वाभाविक है।
यहीं से Sleepmaxxing का दूसरा पहलू सामने आता है। अगर कोई व्यक्ति हर रात अपने स्लीप डेटा को लेकर जरूरत से ज्यादा चिंतित रहने लगे, तो नींद बेहतर होने के बजाय तनाव बढ़ सकता है। इसी तरह की स्थिति को 'ऑर्थोसॉमनिया' कहा जाता है। इसमें व्यक्ति अच्छी नींद लेने और अपने स्लीप डेटा को परफेक्ट बनाने को लेकर इतना ज्यादा चिंतित हो जाता है कि यही चिंता उसकी नींद को प्रभावित करने लगती है।
मान लीजिए आपको सुबह उठकर लगता है कि आपकी नींद अच्छी रही। लेकिन आपकी स्मार्टवॉच या रिंग बताती है कि डीप स्लीप कम रही। इसके बाद आप परेशान होकर अपनी डाइट, सप्लीमेंट या सोने का समय बदलने लगते हैं। यही लगातार निगरानी और चिंता समस्या बन सकती है।
जब नींद को बेहतर बनाने की कोशिश खुद तनाव का कारण बनने लगे, तब यह ट्रेंड उल्टा असर कर सकता है। विशेषज्ञों के मुताबिक, कुछ लोग नींद को लेकर इतनी चिंता करने लगते हैं कि सप्लीमेंट्स और दूसरे उपायों पर जरूरत से ज्यादा निर्भर हो जाते हैं। कुछ मामलों में यह चिंता लंबे समय तक बनी रह सकती है और दवाओं पर निर्भरता का जोखिम भी बढ़ सकता है। नींद के लिए सिर्फ गैजेट या सप्लीमेंट पर निर्भर रहने के बजाय नियमित नींद का समय, सही खान-पान, एक्सरसाइज और बेहतर स्लीप हाइजीन पर ध्यान देना जरूरी है।
Sleepmaxxing की लोकप्रियता को उस लाइफस्टाइल से भी जोड़कर देखा जा सकता है, जिसमें काम, स्क्रीन और ऑनलाइन कनेक्टिविटी ने लोगों के आराम का समय कम किया है। अब लोग उसी थकान से निकलने के लिए नींद को बेहतर बनाने वाले गैजेट्स, सप्लीमेंट्स और टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर रहे हैं। यानी जिस तेज रफ्तार लाइफस्टाइल ने आराम को मुश्किल बनाया, उसी के आसपास नींद को बेहतर करने का एक बड़ा मार्केट भी तैयार हो रहा है।