कभी ओटीटी का पेमेंट, कभी म्यूजिक एप की मेंबरशिप, तो कभी फिटनेस एप के नाम पर पैसे कट जाते हैं। अलग-अलग देखें तो ये रकम बहुत बड़ी नहीं लगती, लेकिन महीने के आखिर में बैंक खाता देखते ही समझ आता है कि छोटी-छोटी कटौतियां मिलकर काफी पैसा ले जा रही हैं। अब Gen Z इसी खर्च पर लगाम कसने के लिए अपने सब्सक्रिप्शन दोबारा चेक कर रहे हैं। जिस एप या सेवा का इस्तेमाल ही नहीं हो रहा, उसके लिए हर महीने पैसे क्यों दें? इसी सोच को इन दिनों 'सब्सक्रिप्शन डिटॉक्स' कहा जा रहा है।
सीधी बात है, अपने फोन और बैंक खाते में चल रहे सभी सब्सक्रिप्शन की एक बार लिस्ट बनाना और देखना कि इनमें से वास्तव में कितने काम के हैं। ओटीटी, म्यूजिक, फिटनेस, गेमिंग, शॉपिंग, पढ़ाई या दूसरी डिजिटल सेवाएं, जो इस्तेमाल में नहीं हैं उन्हें बंद किया जा सकता है। मतलब हर चीज का सब्सक्रिप्शन लेना जरूरी नहीं। जिस सेवा का इस्तेमाल हो रहा है, उसे रखिए और जिस पर महीनों से ध्यान ही नहीं गया, उससे पैसे कटते रहने का कोई मतलब नहीं।
एक एप के 99 रुपये, दूसरे के 149 रुपये और किसी तीसरे के 199 रुपये। अकेले देखें तो कोई भी रकम बहुत बड़ी नहीं लगती। लेकिन अगर हर महीने कई सेवाओं के लिए ऐसा भुगतान हो रहा है, तो कुल खर्च बढ़ता जाता है।
कुछ समय पहले तक नई फिल्म या सीरीज आते ही लोग उस ओटीटी का सब्सक्रिप्शन ले लेते थे, जहां वह उपलब्ध होती थी। एक सीरीज के लिए एक ओटीटी, दूसरी के लिए दूसरा और म्यूजिक के लिए अलग एप। धीरे-धीरे कई सब्सक्रिप्शन एक साथ चलते रहते हैं। अब कुछ लोग इसका दूसरा तरीका अपना रहे हैं। जिस ओटीटी पर कोई खास सीरीज या फिल्म देखनी है, उसका एक महीने का सब्सक्रिप्शन लिया, कंटेंट देखा और जरूरत खत्म होने पर उसे बंद कर दिया। अगली बार कुछ पसंद आया तो दोबारा सब्सक्रिप्शन ले लिया। यानी अब फंडा सीधा है, जरूरत हो तभी सब्सक्राइब करो, काम खत्म तो कैंसिल करो।
कई एप और डिजिटल सेवाएं शुरुआत में कुछ दिनों या एक महीने का फ्री ट्रायल देती हैं। ट्रायल खत्म होने के बाद अगर समय पर सब्सक्रिप्शन बंद नहीं किया, तो पैसे अपने आप कटने शुरू हो सकते हैं। यही वह खर्च है, जो कई बार बिना इस्तेमाल के भी चलता रहता है। इसलिए सब्सक्रिप्शन डिटॉक्स करते समय सिर्फ मौजूदा मेंबरशिप नहीं, बल्कि फ्री ट्रायल और अपने आप होने वाले भुगतान पर भी नजर डालना जरूरी है।
सब्सक्रिप्शन डिटॉक्स का मतलब सिर्फ पैसा बचाना नहीं है। फोन में जरूरत से ज्यादा एप और हर एप पर अलग-अलग कंटेंट होने से डिजिटल जिंदगी भी काफी भरी हुई लग सकती है। जितने ज्यादा एप, उतने ज्यादा नोटिफिकेशन, उतना ज्यादा कंटेंट और उतनी ही ज्यादा चीजें संभालने का झंझट। गैर-जरूरी सब्सक्रिप्शन और एप कम करने से फोन थोड़ा साफ रहता है और यह भी समझ आता है कि वास्तव में किन सेवाओं की जरूरत है।
सबसे पहले अपने बैंक खाते और यूपीआई जैसे भुगतान एप की हिस्ट्री देखिए। पिछले कुछ महीनों में कौन-कौन से पैसे बार-बार कटे हैं, उनकी लिस्ट बनाइए। इसके बाद हर सब्सक्रिप्शन के सामने तीन सवाल रखिए, इसे आखिरी बार कब इस्तेमाल किया था? महीने में कितनी बार इस्तेमाल करता हूं? और क्या इसके बिना मेरा काम चल सकता है? अगर किसी एप को महीनों से नहीं खोला है या उसका काम किसी दूसरी सेवा से हो रहा है, तो उसका सब्सक्रिप्शन बंद किया जा सकता है। शुरुआत उन सेवाओं से करें, जिनका इस्तेमाल सबसे कम होता है। इसके बाद महीने में एक बार अपने चालू सब्सक्रिप्शन जरूर चेक करें।
नहीं। अगर कोई सेवा आपके काम की है और आप उसका नियमित इस्तेमाल करते हैं, तो उसे जारी रखना बिल्कुल ठीक है। सब्सक्रिप्शन डिटॉक्स का मतलब हर सुविधा छोड़ देना नहीं है। असल बात यह है कि बिना सोचे हर महीने पैसे कटते न रहें। जिस चीज के लिए पैसा दे रहे हैं, उसका इस्तेमाल भी हो। आखिर अलग-अलग देखकर 99 या 149 रुपये भले ही छोटे लगें, लेकिन सालभर तक चलने वाली ऐसी कई कटौतियां मिलकर बजट पर असर डाल सकती हैं।