जैसे ही अक्तूबर शुरू होता है, मौसम बदलने लगता है और अचानक मन करता है कि कमरा ठीक कर लें, पुरानी चीजें हटा दें और अपनी पूरी जिंदगी को थोड़ा रीसेट कर लें। अगर आपके साथ भी ऐसा होता है, तो आप अकेले नहीं हैं। Gen Z ने इस अनुभवको एक नाम दे दिया है 'October Theory'।
October Theory आखिर है क्या?
October Theory का मतलब है कि अक्तूबर को साल की एक तरह की दूसरी शुरुआत माना जाए। इस ट्रेंड को लंदन की कंटेंट क्रिएटर इजी अटरसन ने नाम दिया। उनके मुताबिक, अक्तूबर से न्यू ईयर तक करीब 90 दिन होते हैं। यही समय लोगों को पीछे मुड़कर देखने और सोचने पर मजबूर करता है कि साल में अब तक क्या हासिल किया और आगे क्या बदलना है।
इजी ने लोगों को इन 90 दिनों को एक तरह के पर्सनल ग्रोथ चैलेंज की तरह लेने की सलाह दी। यानी जनवरी का इंतजार करने के बजाय अक्तूबर से ही अपने गोल पर काम शुरू कर देना। यह ट्रेंड 2024 के सितंबर के आखिर और अक्तूबर की शुरुआत में टिकटॉक पर तेजी से फैलने लगा। कई क्रिएटर्स ने एक जैसी फीलिंग शेयर की। अचानक अपने पूरे साल का हिसाब लेने और साल खत्म होने से पहले कुछ बदलाव करने का मन होना। इसी वजह से अक्तूबर 1 को जनवरी 1 के अल्टरनेटिव के तौर पर देखा जाने लगा।
इस ट्रेंड के पीछे एक प्रैक्टिकल लॉजिक भी है। अक्तूबर से न्यू ईयर तक करीब 90 दिन मिलते हैं। यानी आपके पास किसी नई हैबिट पर काम करने और उसमें प्रोग्रेस देखने के लिए पर्याप्त समय होता है। साइकोथेरेपिस्ट ब्रियाना पारुओलो के मुताबिक, रिसर्च में पाया गया है कि किसी नए बिहेवियर को ऑटोमैटिक हैबिट बनने में औसतन करीब 66 दिन लग सकते हैं, हालांकि यह व्यक्ति और हैबिट की कॉम्प्लेक्सिटी के हिसाब से अलग हो सकता है। ऐसे में अक्तूबर से शुरुआत करने पर न्यू ईयर तक करीब 90 दिन मिलते हैं।
अक्तूबर में ही ऐसी फीलिंग क्यों आती है?
October Theory सिर्फ टिकटॉक का बनाया हुआ ट्रेंड नहीं है। इसके पीछे साइकोलॉजी का एक कॉन्सेप्ट भी है, जिसे 'फ्रेश स्टार्ट इफेक्ट' कहा जाता है। इसका मतलब है कि किसी खास टर्निंग पॉइंट के बाद लोगों को अपने गोल्स पर दोबारा काम शुरू करने की मोटिवेशन ज्यादा महसूस हो सकती है। सबसे बड़ा एग्जाम्पल है न्यू ईयर। 1 जनवरी आते ही लोग नए रिजॉल्यूशंस बनाते हैं। लेकिन सिर्फ नया साल ही ऐसा मौका नहीं है। महीने की शुरुआत, बर्थडे या मौसम का बदलना भी हमारे दिमाग में एक तरह का साइकोलॉजिकल रीसेट बटन दबा सकता है। अक्तूबर का समय इस फीलिंग के लिए इसलिए भी खास लगता है क्योंकि गर्मियों की छुट्टियों और साल के शुरुआती हिस्से की भागदौड़ के बाद जिंदगी धीरे-धीरे एक रुटीन में लौटने लगती है। काम, पढ़ाई और रोजमर्रा का शेड्यूल फिर से सेटल होने लगता है। और जब जिंदगी के बाहर स्ट्रक्चर वापस आता है, तो अक्सर मन करता है कि अंदर की चीजों को भी थोड़ा व्यवस्थित किया जाए। यानी रूटीन के साथ-साथ गोल्स, हैबिट्स, हेल्थ और पर्सनल लाइफ पर भी दोबारा ध्यान देने का मन होने लगता है।
अक्तूबर मन पर इतना असर क्यों डालता है?
मनोवैज्ञानिक नजरिए से देखें तो October Theory का असर सिर्फ सोशल मीडिया ट्रेंड की वजह से नहीं है। मौसम बदलने के साथ हमारा मूड और रुटीन भी थोड़ा बदलता है। ठंडी हवा, बदलती रोशनी और मौसम का बदलाव हमें स्वाभाविक रूप से थोड़ा रुकने, पीछे देखने और आगे की तैयारी करने के लिए प्रेरित कर सकता है। भारत में अक्तूबर का समय दिवाली के आसपास भी आता है। दिवाली यानी सफाई, पुरानी चीजों को हटाना और नई शुरुआत का समय। यही भावना October Theory से भी जुड़ी हुई है। वहीं दुनिया के कई हिस्सों में अक्तूबर ऑटम यानी पतझड़ का महीना होता है, जिसे पुरानी चीजों को छोड़ने, सोचने और नई शुरुआत की तैयारी से जोड़ा जाता है। यही वजह है कि अक्तूबर को बर्नआउट और नई शुरुआत के बीच का एक ट्रांजिशन पॉइंट माना जा सकता है।
जेन ज़ी ने सोशल मीडिया को एक तरह के ‘इमोशनल कैलेंडर’ में बदल दिया है। लकी गर्ल सिंड्रोम से लेकर मर्करी रेट्रोग्रेड माइंडसेट तक, ऐसे कई वायरल 'थ्योरीज़' लोगों को अपनी फीलिंग्स और जिंदगी को समझने के लिए छोटे-छोटे साइकोलॉजिकल चेकपॉइंट्स देती हैं। जहां वे रुकते हैं, सोचते हैं और फिर खुद को दोबारा अलाइन करने की कोशिश करते हैं।