तमिलनाडु के इरुवादी गांव की पीर बानो चाहती हैं कि हर महिला इज्जत की जिंदगी जिए। इसके लिए वो उन्हें आत्मनिर्भर बनाने का काम करती हैं। स्वयं सहायता समूह की मदद से अबतक 350 महिलाओं को मदद मिल चुकी है। वहीं पीर बानो अभी भी इस नेककाम में जीजान से जुटी हैं।
तमिलनाडु के इरुवादी गांव की पीर बानो खुद अपने पैरों पर खड़ी हैं। और उनकी इच्छा है कि हर महिला ऐसे ही कमाने लायक स्थिति में हो। पीर को उनकी शादी में दहेज में सिलाई मशीन मिली। जिससे वो कपड़े सिलकर परिवार की आय को बढ़ाने में मदद करती हैं। टेलर के परिवार से संबंध रखने वाली पीर को उनके भाई ने सिलाई सिखाई थी। जिसके बाद उनका ये हुनर शादी के बाद परिवार और बच्चों के पालन-पोषण में बहुत काम आया। लेकिन पीर यहीं नहीं रुकी। उन्होंने ट्रस्ट द्वारा संचालित बास्केट मेकिंग ट्रेनिंग प्रोग्राम में हिस्सा लिया। और बास्केट बनाना सीखा। इसके बाद साल 2006 में उन्होंने खुद स्वयं सहायता समूह की शुरूआत की। आज उनके इस समूह में करीब 15 महिलाएं कपड़े बेचकर साथ में केले के रेशों से बने बास्केट बेचकर अच्छी खासी कमाई कर रही हैं।
अपने स्वयं सहायता समूह में वो महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने का काम करती है। साथ ही वो गरीब और विधवा महिलाओं को सिलाई सिखाने का पैसा नहीं लेती। उनकी इच्छा है कि वो अपने पैरों पर खड़ी होकर इज्जत की जिंदगी जिएं। पीर बानों ने ना केवल महिलाओं का उत्थान किया है। बल्कि उनके तीनों बेटे भी काबिल इंसान है। उनका सबसे बड़ा बेटा मुंबई में वाटर बोर्ड में इंस्पेक्टर है। उनका दूसरा बेटा मैकेनिकल इंजीनियर है जो इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन में कार्यरत है। वहीं तीसरे बेटे ने अपनी ई कॉमर्स कंपनी की स्थापना की है। वह अपनी मां की बनाई हुई चीजें बेचने में भी मदद करता है।