संभल में बीते साल 24 नवंबर को भड़की हिंसा की जांच के लिए गठित न्यायिक आयोग ने अपनी रिपोर्ट सौंप दी है। करीब 450 पन्नों वाली रिपोर्ट में हिंसा की वजहों, संभल में दंगों के इतिहास, हिंदुओं की आबादी घटने, धार्मिक स्थलों का अस्तित्व मिटाने समेत तमाम बिंदुओं के बारे में विस्तार से जांच करने के बाद निष्कर्ष दिया गया है। इस हफ्ते खबरों के खिलाड़ी में इसी रिपोर्ट पर चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल सिंह, विनोद अग्निहोत्री, सुनील शुक्ल, पूर्णिमा त्रिपाठी, राकेश शुक्ल और अवधेश कुमार मौजूद रहे।
विनोद अग्निहोत्री: संभल की रिपोर्ट चिंताजनक है। रिपोर्ट सरकार द्वारा गठित एक समिति की रिपोर्ट है। ये रिपोर्ट अभी विधानसभा के पटल पर नहीं रखी गई है। रिपोर्ट में जो बाते हैं वो चिंताजनक है। इसमें ये देखना होगा कि ये पलायन अब रुक गया है या नहीं। अगर ये अभी भी जारी है मौजूदा सरकार पर भी ये सवाल उठेगा। अगर ये पलायन महज सांप्रदायिक कारण से हुआ है तो बहुत चिंतनीय है। अगर ये दूसरी वजहों से हुआ है तो उसे भी सामने आना चाहिए।
अवधेश कुमार: रिपोर्ट में जो बातें कही गई हैं कि वो स्थितियां वहां पहले से दिखाई दे रही हैं। दूसरे देशों के हथियार वहां कैसे पहुंचे ये देखने का विषय है। रिपोर्ट में कुछ लोगों के नाम दिए हैं। उनसे बातचीत का जिक्र है। ये बहुत ही भयानक स्थिति है। ये चीजें पहले से मालूम है। यह बताता है कि डेमोग्राफी बदलने से परिस्थितियां क्या हो सकती हैं।
सुनील शुक्ल: संभल को लेकर दो रिपोर्ट आई हैं। दोनों को पढ़ना चाहिए। लखनऊ हो या प्रयागराज हो, वो इलाके जहां मुस्लिम आबादी ज्यादा वहां काफी कुछ बदला है। ये देखना होगा कि ये बदलाव क्यों हुए हैं। किसी भी इलाके में अगर आतंकवादी संगठन सक्रिय हैं वो चिंता का विषय है। शहरीकरण बढ़ रहा है क्या ये चिंता का विषय नहीं है। अगर आप मुद्दों को राजनीतिक लाभ के हिसाब से व्याख्या करेंगे तो ये चिंता का विषय है। हिंदू या मुसलमान के बढ़ने को नहीं बल्कि उसके कारणों पर मंथन होना चाहिए।
राकेश शुक्ल: पलायन सिर्फ रोजगार के लिए हो रहा है ये भी कहना कठिन है। कई राज्यों में ऐसे इलाके हैं जहां बहुसंख्यक हिंदू अल्पसंख्यक हो गया। क्या उसका कारण सिर्फ रोजगार है? इसलिए इसे राजनीतिक चश्मे से देखने के बजाय सामाजिक चश्मे से देखने की जरूरत है। जिससे इसमें सुधार हो सके।
पूर्णिमा त्रिपाठी: मैं भी यह बात कहूंगी कि इसे सिर्फ राजनीतिक या आर्थिक चश्मे से देखने के बजाय इसे एक सामाजिक समस्या के रूप में देखना चाहिए। पलायन का जो मामला है उसकी कई वजहें होती हैं। जिसकी वजह से उन जगहों की डेमोग्राफी बदलती है। वजहें अलग-अलग तरह की होती हैं। मुझे इस बात की चिंता है कि ये एक गोपनीय रिपोर्ट है जिस पर अभी सार्वजनिक तौर पर चर्चा हो रही है। अगर आतंकी आकर बस गया तो ये क्या किसी कम्युनिटी की वजह से हो रहा है या ये सरकारों की विफलता है।
रामकृपाल सिंह: ये रिपोर्ट न भी आती तब भी जो सवाल मैं पूछ रहा हूं वो कोई भी पूछेगा। एक दौर था जब सारे हमले गुजरात के कच्छ से पंजाब तक के इलाके से हुए। जिन लोगों ने पलायन वो इन इलाकों से थे। फिर औद्योगीकरण के बाद उन इलाकों से पलायन हुए जहां आबादी का घनत्व ज्यादा था। सवाल ये है कि जिस जगह से जो बात कभी नहीं हुई वहां वो बात कैसे हो गई। तब सवाल उठते हैं। जहां असामान्य घटनाएं होती हैं तो सवाल उठते हैं।