सामाजिक न्याय का उद्देश्य समाज में नई खाइयां बनाना नहीं, पुरानी खाइयों को पाटना है। आरक्षण उस पुल का एक हिस्सा है, पूरा पुल नहीं। शिक्षा, कौशल, अवसर, निष्पक्ष चयन, पारदर्शी व्यवस्था और कानून का समान अनुपालन उस पुल के दूसरे हिस्से हैं। यदि सरकार इन सभी को साथ लेकर चलती है तो सामाजिक न्याय राजनीतिक नारे से निकलकर शासन का संस्कार बनता है। आरक्षण उसका साधन है, प्रतिनिधित्व उसका माध्यम है और अवसर की वास्तविक समानता उसका लक्ष्य। सामाजिक न्याय की यही अवधारणा उत्तर प्रदेश में चरितार्थ हो रही है। योगी सरकार में की गईं तमाम भर्तियां इसका सशक्त प्रमाण हैं।
राजनीति में किसी व्यवस्था को अपने पक्ष-विपक्ष में दिखाना आसान है, पर प्रशासन के लिए कानून के मुताबिक उसे जमीन पर उतारना कहीं ज्यादा मुश्किल काम है। आरक्षण के मामले में भी यही फर्क अहम है। एक तरफ इसके राजनीतिक मायने निकाले जाते हैं, दूसरी तरफ प्रशासनिक और चयन संस्थाओं पर संवैधानिक प्रावधानों को सही तरीके से लागू करने की जिम्मेदारी होती है। उत्तर प्रदेश में 1 अप्रैल 2017 से 31 मार्च 2026 तक हुई सरकारी नियुक्तियों के आंकड़ों के मुताबिक कुल नियुक्तियों में सामान्य वर्ग की हिस्सेदारी 37.93 प्रतिशत रही। ओबीसी वर्ग को 36.38 प्रतिशत, अनुसूचित जाति को 20.14 प्रतिशत, अनुसूचित जनजाति को 0.97 प्रतिशत और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को 4.58 प्रतिशत हिस्सेदारी मिली। ये आंकड़े यह समझने का आधार देते हैं कि आरक्षण और नियुक्ति की व्यवस्था असल में किस दिशा में चल रही है।
उत्तर प्रदेश लोक सेवा अधिनियम, 1994 और संबंधित शासनादेशों के मुताबिक आरक्षण का फायदा अंतिम चयन के स्तर पर ही मिलता है। इसलिए प्रारंभिक परिणाम को ही अंतिम आरक्षण व्यवस्था मान लेना न तो कानूनी प्रक्रिया की सही तस्वीर पेश करता है, न ही अभ्यर्थियों के बीच फैली गलतफहमी दूर करता है। इसी सिलसिले में सितंबर 2025 का न्यायिक घटनाक्रम भी अहम है। उच्च न्यायालय की एकल पीठ के 25 सितंबर 2025 के आदेश की एक ऐसी व्याख्या सामने आई, जिससे लगा कि प्रारंभिक परीक्षा परिणाम में त्रिस्तरीय आरक्षण लागू हो गया है। उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग ने इसके खिलाफ विशेष अपील दाखिल की, और अगले ही दिन, 26 सितंबर 2025 को खंडपीठ ने एकल पीठ के आदेश पर रोक लगा दी। मामला अभी अदालत में लंबित है।
सामाजिक न्याय का तीसरा पहलू प्रतिनिधित्व का है। सरकारी संस्थाओं में समाज के अलग-अलग वर्गों की मौजूदगी लोकतंत्र की साख मजबूत करती है। इसी सिलसिले में योगी सरकार ने नवगठित उत्तर प्रदेश आउटसोर्स सेवा निगम (UPCOS) के तहत आउटसोर्स नौकरियों में आरक्षण नियमों को डिजिटल तरीके से लागू किया है। संविदा नियुक्तियों में अनुसूचित जाति को 21 प्रतिशत, अनुसूचित जनजाति को 2 प्रतिशत और ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण देने का प्रावधान है। योगी सरकार ने इसमें 2019 के राष्ट्रीय संवैधानिक संशोधन के तहत 10 प्रतिशत ईडब्ल्यूएस आरक्षण को भी जोड़ा है।
प्रतिनिधित्व को सिर्फ आंकड़ों तक सीमित रखना भी सही नहीं। इसका असली मकसद सशक्तीकरण है। ऐसा सशक्तीकरण जहां अगली पीढ़ी को अवसर पाने के लिए किसी व्यवस्था पर निर्भर न रहना पड़े, बल्कि वह खुद प्रतिस्पर्धा में सक्षम हो सके। इसीलिए अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के कोटे में पात्र अभ्यर्थियों की कमी को भी बड़े संदर्भ में देखना चाहिए। इसका हल सिर्फ रिक्तियों की गिनती पर राजनीतिक बहस नहीं हो सकता, बल्कि यह देखना ज़रूरी है कि पात्र अभ्यर्थियों का दायरा कैसे बढ़े—गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, कौशल, तैयारी और आर्थिक मदद तक पहुंच कैसे आसान हो। यहीं से सामाजिक न्याय की बहस आरक्षण से निकलकर शिक्षा और अवसर की बहस बन जाती है।
(अस्वीकरण: ये लेखक के निजी विचार हैं। लेख में दी गई जानकारी और तथ्यों के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। लेखक हरिशंकर मिश्र, वरिष्ठ पत्रकार हैं।)