किसी भी राज्य की वास्तविक पूंजी किसे माना जा सकता है-प्राकृतिक संसाधनों को, इन्फ्रास्ट्रक्चर को, या फिर उद्योगों को ? इस सवाल के जवाब अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन राज्य की वास्तविक संपदा उसका कुशल मानव संसाधन है और यही उसे समृद्धि के मार्ग पर भी ले जाता है। भूमि, खनिज, पूंजी और आधुनिक तकनीक विकास के आवश्यक घटक हैं, लेकिन इन सभी को उत्पादक शक्ति में बदलने का कार्य प्रशिक्षित, दक्ष और नवाचार में विश्वास रखने वाला मानव संसाधन ही करता है। कुशल मानव संसाधन ही सामाजिक परिवर्तन का भी सबसे प्रभावी माध्यम है। यह उत्पादकता बढ़ाता है, युवाओं के पलायन को रोककर स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाता है। उत्तर प्रदेश ने पिछले नौ वर्षों में ‘स्किल इंडिया’ के राष्ट्रीय संकल्प को धरातल पर उतारते हुए स्वयं को ‘कौशल प्रदेश’ में गढ़ा है।
प्रदेश वही है जो अब से दस साल पहले था, लेकिन तब से अब तक व्यापक बदलावों की सीढ़ियां तय करते हुए राज्य ने अपनी मानसिकता भी बदली है। विश्व युवा कौशल दिवस पर आयोजित राज्य स्तरीय समारोह में मुख्यमंत्री ने जो आंकड़े साझा किए, वे उनकी नीतियों की सफलता का परिचायक हैं। पिछले नौ वर्षों में सरकार ने नौ लाख से अधिक युवाओं को पारदर्शिता के साथ सरकारी नौकरियां दी हैं, जबकि सवा तीन करोड़ से अधिक युवा और कारीगर रोजगार तथा स्वरोजगार से जुड़ चुके हैं। यह आंकड़े यूपी में आत्मनिर्भरता, आर्थिक स्थिरता और लोगों में आ रहे आत्मविश्वास को सामने रखते हैं।
योगी सरकार की रणनीति की सबसे बड़ी विशेषता है पारंपरिक कौशल और आधुनिक तकनीक के बीच सेतु का निर्माण। प्रदेश की 96 लाख से अधिक एमएसएमई इकाइयां आज अर्थव्यवस्था की मजबूत आधारशिला बन चुकी हैं। मुरादाबाद का पीतल उद्योग, फिरोजाबाद का ग्लास उद्योग, मेरठ का खेल उद्योग, भदोही का कालीन उद्योग, लखनऊ की चिकनकारी, आजमगढ़ की ब्लैक पॉटरी और बनारसी साड़ी जैसे कई परंपरागत उत्पाद आज ओडीओपी के जरिये वैश्विक पहचान अर्जित कर रहे हैं। विकास के मॉडल में परंपरा और आधुनिकता का यह अद्भुत समन्वय है।
राज्य के लिए यह जरूरी है कि वह समय की मांग को समझे। योगी सरकार ने इसे समझा और इसके अनुरूप ही स्किल डेवलपमेंट के लिए युवाओं को संसाधन उपलब्ध कराए। आईटीआई और कौशल विकास केंद्रों में अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स, ड्रोन टेक्नोलॉजी, थ्रीडी प्रिंटिंग और सेमीकंडक्टर निर्माण जैसे क्षेत्रों में प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इस व्यवस्था को अधिक पारदर्शी बनाने के लिए तकनीक का बेहतरीन उपयोग एक बड़ा पक्ष है। डिजिटल पोर्टल ‘कौशल सेतु’ से प्रशिक्षण भागीदारों का पंजीकरण और एम्पैनलमेंट पेपरलेस और पारदर्शी बनेगा। इसके साथ ही ‘कौशल सारथी’ प्लेटफॉर्म युवाओं को उनके जिले के प्रशिक्षण केंद्रों, कोर्सों और भागीदारों की जानकारी एक ही स्थान पर सुलभ कराएगा। डिजिटल पारदर्शिता भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद की गुंजाइश समाप्त करती है और सुशासन के लिए भी यह जरूरी है।
कौशल विकास आर्थिक सशक्तीकरण के साथ-साथ आत्मविश्वास और सामाजिक गरिमा का आज बड़ा स्रोत है। प्रदेश के युवा इसके बड़े उदाहरण हैं। जैसे कि पिता के निधन के बाद बरेली की राजरानी को कौशल विकास मिशन के तहत मिले प्रशिक्षण ने आत्मविश्वास से परिपूर्ण किया। हरियाणा में नौकरी करते हुए उसने कैंसर से जूझ रही अपनी मां का इलाज कराया और परिवार की जिम्मेदारी संभाली। उन्नाव के कृष्ण कुमार साहू आईटीआई से प्रशिक्षण लेकर आज एनसीएल (कोल इंडिया) में लगभग एक लाख रुपये प्रतिमाह कमा रहे हैं। इसी तरह चंदौली की भावना दुबे आईटीआई से फैशन डिजाइनिंग सीखकर स्वरोजगार से 70 हजार रुपये मासिक से अधिक की आय कर रही हैं।
ये सभी उदाहरण अलग-अलग जिलों और पृष्ठभूमि से हैं लेकिन इनमें एक सूत्र समान है और वह है अवसर, प्रशिक्षण और संवेदनशील नीतियां। यही वह ‘डेमोग्राफिक डिविडेंड’ है जिसकी बात मुख्यमंत्री बार-बार करते हैं। दुनिया का सबसे बड़ा युवा वर्ग होना तभी गर्व का विषय बनता है जब उस स्केल को स्किलिंग से जोड़कर उत्पादक शक्ति में बदला जाए। उत्तर प्रदेश में यह परिवर्तन शहरी शिक्षित वर्ग तक सीमित न रहकर अब गांव-गांव तक देखने को मिल रहा है और निवेशकों को भी ऐसी ही जनशक्ति चाहिए।
कोई भी उद्योग किसी राज्य का चयन करते समय सबसे पहले वहां उपलब्ध कुशल कार्यबल देखता है। जब प्रदेश में ही प्रशिक्षित, तकनीकी रूप से दक्ष कार्यबल उपलब्ध हो, तो निवेशकों को अलग से प्रशिक्षण ढांचा खड़ा करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। यही कारण है कि उत्तर प्रदेश आज निवेश के अनुकूल गंतव्य बन रहा है, और इसकी नींव में वे लाखों आईटीआई, कौशल विकास केंद्र और डिजिटल प्लेटफॉर्म हैं, जिन्हें सरकार ने नौ वर्षों में सुनियोजित ढंग से खड़ा किया है। निःसंदेह यह यात्रा अभी पूर्ण नहीं हुई है। कौशल विकास की गति और तीव्र करना, प्रशिक्षण की गुणवत्ता वैश्विक मानकों के अनुरूप बनाए रखना और हर जिले तक सुविधाओं का समान वितरण सुनिश्चित करना आगे की चुनौतियां हैं।
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अस्वीकरण: ये लेखक के निजी विचार हैं। लेखक प्रो. संजय सिंह बघेल दिल्ली विश्वविद्यालय के आत्मा राम सनातन धर्म कॉलेज में कार्यरत हैं।)