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विचार: कर्तव्य की कठोरता और करुणा की कोमलता

Sat, 24 Oct 2026 07:38 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र रतन कुमार श्रीवास्तव

सार

कभी किसी पुल की रेलिंग पर, कभी रेलवे ट्रैक के किनारे, तो कभी घर की बंद दीवारों के पीछे, जब कोई इंसान जिंदगी से हार मान चुका होता है, तब महज एक संदेश मिलने पर कुछ पुलिसकर्मी बिना एक पल गंवाए उसकी मदद के लिए दौड़ पड़ते हैं।
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यूपी पुलिस परेड। सांकेतिक तस्वीर। - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
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पुलिस का नाम आते ही आंखों के सामने एक सख्त चेहरा उभरता है, जो अनुशासित है, रौबदार है और अपने कर्तव्य के प्रति अडिग है। यूपी में पुलिस का यह कठोर रूप अपराधियों के लिए खौफ का दूसरा नाम बन चुका है। कानून से खिलवाड़ करने वाले जानते हैं कि अब बचकर निकलने की राहें पहले जैसी आसान नहीं रह गई हैं। लेकिन इसी वर्दी के भीतर एक ऐसा दिल भी धड़कता है, जो चुपचाप अपना काम करता है। वह सुर्खियों में भले ही कम आता हो, लेकिन समाज के लिए उसका महत्व कहीं अधिक है।
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कभी किसी पुल की रेलिंग पर, कभी रेलवे ट्रैक के किनारे, तो कभी घर की बंद दीवारों के पीछे, जब कोई इंसान जिंदगी से हार मान चुका होता है, तब महज एक संदेश मिलने पर कुछ पुलिसकर्मी बिना एक पल गंवाए उसकी मदद के लिए दौड़ पड़ते हैं। वे डांटते नहीं, सुनते हैं। वे आदेश नहीं देते, बल्कि हाथ थामते हैं। उस क्षण वही वर्दी, जिससे अपराधी कांपते हैं, टूटते हुए मन के लिए भरोसे का दूसरा नाम बन जाती है।
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एक जनवरी 2023 से 10 अक्तूबर 2026 के बीच यूपी पुलिस ने सोशल मीडिया पर आत्महत्या का संकेत देने वाले चार हजार से अधिक लोगों तक समय रहते पहुंचकर उन्हें मौत के मुहाने से वापस लौटा लिया। जिंदगी की राह पर दोबारा लौटे ऐसे हर व्यक्ति के पीछे एक परिवार है, जहां कोई मां आज अपने बेटे को खाना परोस रही है, कोई पिता अपने बच्चे के सिर पर हाथ फेर रहा है, तो कोई पत्नी अपने जीवनसाथी की राह देख रही है।

वर्ष 2022 से यूपी पुलिस और मेटा कंपनी के बीच जारी समन्वय के तहत, जब फेसबुक या इंस्टाग्राम पर आत्महत्या से जुड़ी कोई पोस्ट सामने आती है, तो कंपनी पुलिस मुख्यालय के सोशल मीडिया सेंटर को ई-मेल और फोन के माध्यम से अलर्ट भेजती है। अलर्ट मिलते ही स्थानीय थाने की पुलिस टीम कुछ ही मिनटों में उस दरवाजे पर पहुंच जाती है, जिसके पीछे कोई व्यक्ति जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहा होता है।

यहां तकनीक साधन है, साध्य नहीं। मशीन अलर्ट भेज सकती है, लेकिन किसी को यह भरोसा दिलाना कि वह अकेला नहीं है, यह काम संवेदनशील हृदय रखने वाला व्यक्ति ही कर सकता है। यही संवेदनशीलता अब यूपी पुलिस की विशिष्ट पहचान के रूप में उभर रही है।

लखनऊ के सआदतगंज की घटना इसका उदाहरण है। छब्बीस वर्ष का एक डिलीवरी बॉय दिनभर दूसरों के दरवाजों तक उनकी जरूरत का सामान पहुंचाता था। लेकिन पत्नी और ससुराल पक्ष के साथ विवाद के बोझ तले वह इस कदर टूट गया कि उसने इंस्टाग्राम पर आत्महत्या से जुड़ा एक वीडियो पोस्ट कर दिया। नदी के किनारे खड़ा वह युवक शायद उस समय अपनी जिंदगी का आखिरी फैसला लेने की कगार पर था।

मेटा से अलर्ट मिला, मुख्यालय ने उसकी लोकेशन का पता लगाया और थाने की टीम करीब दस मिनट में उस तक पहुंच गई। ये दस मिनट एक जीवन और मृत्यु के बीच की दूरी थे। पुलिस ने न केवल उसे नदी से दूर किया, बल्कि बाद में उसकी काउंसलिंग भी कराई और परिजनों को भी उसकी मदद की इस प्रक्रिया से जोड़ा। यही वह बारीक फर्क है, जो कर्तव्य और संवेदना के बीच की रेखा को स्पष्ट करता है। कर्तव्य जान बचा लेता है, जबकि संवेदना जीने की वजह लौटाती है।

गाजियाबाद के लिंक रोड की कहानी भी कम मार्मिक नहीं है। चौबीस साल का एक युवक घर का खर्च नहीं उठा पाने के कारण पैदा हुई आर्थिक तंगी से इतना हताश हो गया कि उसने अपनी जान लेने की तैयारी कर ली और इससे जुड़ा संदेश सोशल मीडिया पर पोस्ट कर दिया। पुलिस टीम महज आठ मिनट में उसके घर पहुंच गई, जहां कमरे में फंदा लटका हुआ था। एक पल की भी देरी होती, तो शायद एक परिवार का चिराग बुझ चुका होता। पुलिस ने युवक को यह हौसला दिया कि जीवन की मुश्किलें स्थायी नहीं होतीं और उनसे निकलने के रास्ते तलाशे जा सकते हैं।
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इन दोनों घटनाओं में समय सबसे महत्वपूर्ण इकाई के रूप में सामने आता है। आठ मिनट और दस मिनट। ये आंकड़े उस तत्परता की गवाही देते हैं, जो तब पैदा होती है जब व्यवस्था यह मानकर चलती है कि हर जान कीमती है। इसका श्रेय उस सोच को भी जाता है, जो नेतृत्व के स्तर पर तय होती है।  इस पूरे प्रसंग में उन अनाम पुलिसकर्मियों को भी याद किया जाना चाहिए, जो सोशल मीडिया सेंटर में बैठकर लगातार अलर्ट पर नजर रखते हैं और सूचना मिलते ही मदद के लिए रवाना हो जाते हैं। ऐसे मामलों में समाज के रूप में हम सभी की भी एक जिम्मेदारी है। अगर किसी दोस्त, रिश्तेदार या सहकर्मी की बातों में निराशा झलके, कोई अचानक चुप रहने लगे या सोशल मीडिया पर उसकी पोस्ट में जिंदगी से थकान दिखाई दे, तो उसे अनदेखा न करें। एक फोन कॉल, एक मुलाकात या सहज बातचीत कई बार वह काम कर सकती है, जो बड़ी से बड़ी व्यवस्था भी नहीं कर पाती।  

(अस्वीकरण: ये लेखक के निजी विचार हैं। लेख में दी गई जानकारी और तथ्यों के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। लेखक रतन कुमार श्रीवास्तव, पूर्व आईपीएस अधिकारी हैं।)
 
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