भारतीय चिंतन ने सदा नारी को शक्ति के रूप में देखा है, कमजोरी के रूप में नहीं। स्वामी विवेकानंद का प्रसिद्ध कथन है कि जिस राष्ट्र में नारी की पूजा होती है, वहां देवता निवास करते हैं। समाज की प्रगति का मार्गदर्शक सिद्धांत भी यही है और राष्ट्र की समृद्धि भी तभी संभव है, जब उसकी आधी आबादी को स्वावलंबन की दिशा देने के साथ ही सम्मान भी दिया जाए। उत्तर प्रदेश के सामाजिक उत्थान के मूल में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की दृष्टि भी यही है कि मातृशक्ति को सशक्त बनाया जाए और लोकमाता अहिल्याबाई मातृशक्ति यात्रा योजना इसी की एक कड़ी है। योगी सरकार ने साठ वर्ष और उससे अधिक आयु की माताओं-बहनों को निःशुल्क बस यात्रा की सुविधा देकर देवी अहिल्याबाई को समाज की वरिष्ठ और बुजुर्ग महिलाओं के सम्मान का प्रतीक बना दिया है।
योगी सरकार रक्षाबंधन पर महिलाओं को मुफ्त बस यात्रा की सुविधा देती रही है तो इसके पीछे इस पर्व के प्रति उसका सम्मान भाव है। रक्षाबंधन का धागा भाई-बहन के स्नेह का प्रतीक है। सरकार ने उसी धागे में सुरक्षा और सुविधा को पिरो दिया है। कल्पना कीजिए उस वृद्धा का चेहरा, जो वर्षों से किसी पर्व पर अपने भाई के घर इसलिए नहीं जा पाती थी क्योंकि किराया एक बोझ था। अब वही यात्रा उसके लिए स्वाभिमान के साथ संभव है। यह नीति केवल बस के टिकट की छूट नहीं देती, यह बुजुर्ग महिलाओं को यह अहसास कराती है कि राज्य उनकी गरिमा का भागीदार है।
मुख्यमंत्री की यह घोषणा भी अत्यंत महत्वपूर्ण है, जिसमें उन्होंने कहा कि स्नातक में पढ़ने वाली पचास हजार बेटियों को अक्तूबर-नवंबर में स्कूटी दी जाएगी। यह योजना केवल एक वाहन देने की बात नहीं है, यह बेटियों की स्वतंत्र गतिशीलता, उनकी शिक्षा तक निर्बाध पहुंच और उनके आत्मविश्वास की कहानी है। जो बेटी कभी दूर के कॉलेज जाने से इसलिए हिचकती थी क्योंकि रास्ता सुरक्षित नहीं लगता था या साधन उपलब्ध नहीं था, अब वह अपनी स्कूटी पर सवार होकर अपने सपनों की दिशा में निकल सकेगी। शिक्षा से आत्मनिर्भरता तक की यह दूरी, यह योजना पाटने का प्रयास करती है।
महिलाएं अब चूल्हे से चेक तक, चेक से कारोबार तक और कारोबार से टेक्नोलॉजी तक में भागीदारी निभा रही हैं। यह यात्रा उस दिन से शुरू होती है जब एक महिला पहली बार बैंक खाता खुलवाती है, आगे बढ़ती है जब वह स्वयं सहायता समूह से जुड़कर अपना छोटा व्यवसाय शुरू करती है और समाज के समक्ष आदर्श बनती है। डिजिटल भुगतान करती, ऑनलाइन विपणन सीखती और तकनीक की भाषा बोलती महिला इस यात्रा का हिस्सा है। उत्तर प्रदेश, जहां लगभग साढ़े बारह करोड़ की जनसंख्या आधी आबादी यानी महिलाओं की है, का स्वरूप अब बदला हुआ है और इसे स्पष्ट देखा जा सकता है।
पंडित दीनदयाल उपाध्याय का एकात्म मानववाद यह कहता है कि परिवार और समाज की समग्र उन्नति तभी संभव है जब उसकी हर इकाई, विशेषकर नारी, सशक्त और आत्मनिर्भर हो। हमें स्मरण रखना होगा कि सशक्तीकरण केवल आर्थिक सहायता से नहीं आता, वह गरिमा और अवसर के सम्मिलन से जन्म लेता है।
(अस्वीकरण: ये लेखिका के अपने विचार हैं। लेख में दी गई जानकारी और तथ्यों के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। लेखिका सुधा मोदी एक समाजसेविका और उद्यमी हैं।)