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विचार: आत्मविश्वास की वैश्विक यात्रा है यूपीआईटीएस

Fri, 25 Sep 2026 12:34 PM IST
अमन तिवारी हरिशंकर मिश्र
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UP International Tradeshow - फोटो : अमर उजाला
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उत्तर प्रदेश इंटरनेशनल ट्रेड शो (यूपीआईटीएस) के चौथे संस्करण का आगाज हो गया है। इसने एमएसएमई की उद्यमशीलता, ओडीओपी की स्थानीय विशिष्टता और स्टार्टअप की नवाचार ऊर्जा को एक सूत्र में पिरोकर प्रदेश के आर्थिक सामर्थ्य को एक नई दिशा दी है। 25 से 29 सितंबर तक ग्रेटर नोएडा स्थित इंडिया एक्सपो सेंटर एंड मार्ट में इसका चौथा संस्करण होने जा रहा है। इसके पहले तीन संस्करणों को देखें तो पहला संस्करण एक प्रयोग था, दूसरा और तीसरा उस प्रयोग की सफलता की पुष्टि और अब चौथा संस्करण उत्तर प्रदेश पर अंतरराष्ट्रीय व्यापार जगत के भरोसे का प्रतीक है।
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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के ‘लोकल फॉर ग्लोबल’ के आह्वान को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जिस गंभीरता से एक शासकीय मिशन में बदला है,  उसकी शाखाओं में सबसे प्रमुख एमएसएमई का विस्तार है। पिछले नौ वर्षों में किए गए सरकारी प्रयासों का परिणाम है कि आज प्रदेश की लगभग एक करोड़ एमएसएमई इकाइयां चार करोड़ लोगों को रोजगार दे रही हैं और विश्व बाजार से सीधे जुड़कर उत्तर प्रदेश की आर्थिकी को मजबूत कर रही हैं। ओडीओपी योजना ने विकास की कहानी को लखनऊ, नोएडा या कानपुर जैसे बड़े केंद्रों तक सीमित नहीं रखा। उसने 75 जिलों की अपनी-अपनी आर्थिक पहचान को सामने रखा।

बनारस का वस्त्र, मुरादाबाद का पीतल, भदोही का कालीन, कन्नौज का इत्र, फिरोजाबाद का कांच, सहारनपुर की लकड़ी की नक्काशी, आगरा का फुटवियर और लखनऊ की चिकनकारी, अब ये उत्पाद नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश की आर्थिक और सांस्कृतिक पूंजी हैं। ये वही स्थानीय उद्योग हैं जो एक दशक पहले के परिदृश्य में दम तोड़ते दिखाई देते थे, लेकिन आज वे पूरे गर्व से इंटरनेशनल ट्रेड शो के भागीदार हैं। हर जिले की पहचान को संगठित और वैश्विक ब्रांड में बदलना सरकार के नीतिगत हस्तक्षेप का प्रतिबिंब है। वस्तुतः यह स्वदेशी-चिंतन की अवधारणा का वह विस्तार है, जिसमें सच्ची स्वतंत्रता को गांव की आत्मनिर्भरता से जोड़ा जाता है।
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आंकड़ों की दृष्टि से यूपीआईटीएस की वृद्धि-रेखा स्पष्ट है। 2025 के तीसरे संस्करण में 80 देशों से अंतराष्ट्रीय खरीदार आए थे तो चौथे संस्करण में यह संख्या 85 देशों तक पहुंच चुकी है। यह भी स्वीकार करना आवश्यक है कि स्थानीय उत्पाद को वैश्विक बाजार तक पहुंचाना केवल एक प्रदर्शनी-स्थल उपलब्ध कराने भर से पूरा नहीं होता। अंतरराष्ट्रीय व्यापार की अपनी कठोर शर्तें हैं- गुणवत्ता प्रमाणन, पर्यावरणीय व श्रम मानक, वैश्विक आपूर्ति-श्रृंखला में समय पर डिलीवरी की क्षमता, और मुद्रा तथा शुल्क संबंधी जटिलताओं से निपटने की दक्षता। एक कुम्हार या बुनकर, जिसने जीवन भर स्थानीय मंडी के लिए काम किया हो, उसे इन जटिलताओं के लिए तैयार करना आसान नहीं था लेकिन सरकार की दीर्घकालिक, धैर्यपूर्ण और संस्थागत नीतियों ने इसे संभव बनाया।

ट्रेड शो के आयोजन की संरचना में इसकी गंभीरता झलकती है। यह अब केवल उत्पाद-प्रदर्शनी नहीं रह गया, बल्कि इसमें व्यापारिक संवाद, नीति-गोष्ठियां, बी2बी वार्ताएं और निवेश-समझौतों की प्रक्रिया शामिल है। नीति-निर्माता, उद्योगपति और छोटे उद्यमियों का एक मंच पर आना ही इसकी सबसे बड़ी सार्थकता है। उत्तर प्रदेश ने अपनी आर्थिक नीति में उत्सवधर्मिता से आगे बढ़कर संस्थागत परिपक्वता प्राप्त की है। आने वाले वर्षों में यह आयोजन वास्तविक निर्यात-मूल्य, स्थायी अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों और एमएसएमई क्षेत्र की संरचनात्मक क्षमता-वृद्धि में और परिणत होता दिखाई देगा, जो 'लोकल टू ग्लोबल' की मूल सोच है। उत्तर प्रदेश की ‘लोकल’ अवधारणा भी बदल रही है। लोकल का मतलब अब केवल हस्तशिल्प या पारंपरिक उत्पाद नहीं है। किसी जिले का टेक स्टार्टअप भी लोकल है, किसी कस्बे की फूड-प्रोसेसिंग यूनिट भी लोकल है, किसी युवा का एग्रीटेक समाधान भी लोकल है और किसी छोटे शहर की इंजीनियरिंग इकाई भी लोकल है।

अब बड़ा सवाल है कि उत्तर प्रदेश इंटरनेशनल ट्रेड शो राज्य को वन ट्रिलियन डॉलर इकॉनमी तक ले जाने में कितना सहायक होगा? सबसे पहले तो यह स्पष्ट होना चाहिए कि वन ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने का लक्ष्य केवल एक आर्थिक आंकड़ा मात्र नहीं है। राज्य की निर्यात संवर्धन नीति 2025-30 में भी एक ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था के लक्ष्य को व्यापक आर्थिक परिवर्तन से जोड़ा गया है। इसका सीधा अर्थ है कि ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था केवल बड़े निवेश और बड़े उद्योगों से नहीं बनेगी। उसके लिए प्रदेश के लाखों छोटे उद्यमों को अधिक उत्पादक, अधिक प्रतिस्पर्धी और अधिक निर्यातक्षम बनाना होगा। एक करोड़ के आसपास एमएसएमई इकाइयों और उनसे जुड़े करोड़ों रोजगार की क्षमता को वैश्विक मांग से जोड़ दिया जाए तो यह संख्या अपने आप में एक विशाल आर्थिक शक्ति बन जाती है। एमएसएमई, ओडीओपी, स्टार्टअप तथा पहली बार निर्यात करने वालों को वैश्विक बाजार से जोड़ना ही होगा, जो ग्रेटर नोएडा में हो रहे ट्रेड शो के रूप में एक बड़े मंच के रूप में सामने है। 
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(अस्वीकरण: ये लेखक के निजी विचार हैं। लेख में दी गई जानकारी और तथ्यों के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। लेखक हरिशंकर मिश्र, वरिष्ठ पत्रकार हैं।)
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