ग्राम पंचायतें भारतीय लोकतंत्र की आधारभूत इकाइयां हैं, उनका सशक्त और सक्रिय बने रहना ही लोकतांत्रिक मूल्यों की वास्तविक रक्षा है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस संबंध में नीतिगत निर्णय लेकर ग्राम पंचायतों को अधिक सशक्त, स्वावलंबी और आत्मविश्वासी बनाने का मार्ग प्रशस्त किया है। निवर्तमान ग्राम प्रधानों को प्रशासक के रूप में नियुक्त करने का निर्णय ग्राम स्वराज और ग्राम समाज की उस लोकतांत्रिक अवधारणा को मूर्त रूप देता है, जिसमें स्थानीय इकाइयों के अधिकारों और उनकी निरंतरता की रक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होती है।
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लोकतंत्र और सत्ता का विकेंद्रीकरण
एकात्म मानववाद के प्रणेता पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने कहा था- ‘जब तक हम समाज के सबसे निचले स्तर पर रहने वाले व्यक्ति के आर्थिक और सामाजिक उत्थान को सुनिश्चित नहीं करते, तब तक स्वतंत्रता और लोकतंत्र के कोई मायने नहीं हैं। सत्ता का विकेंद्रीकरण ही वास्तविक लोकतंत्र की कुंजी है।’ इस दर्शन में यह निहित है कि शीर्ष पर बैठी व्यवस्था को नीचे की लोकतांत्रिक इकाइयों पर नियंत्रण न रखकर उन्हें संबल देना चाहिए। पंचायत चुनावों तक ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाए रखना इसी दर्शन का व्यावहारिक रूप है। अब से पहले यह देखा जाता रहा है कि स्थानीय निकायों का कार्यकाल समाप्त होने या अपरिहार्य कारणों से चुनाव समय पर नहीं हो पाने पर नौकरशाही को कमान सौंप दी जाती थी। विकास खंड स्तर के अधिकारियों या सरकारी कर्मचारियों को प्रशासक नियुक्त कर दिया जाता था। लेकिन, उनमें जनता के प्रति जवाबदेही का भावनात्मक पहलू नहीं देखने को मिलता था। इसके विपरीत, एक निर्वाचित ग्राम प्रधान भले ही तकनीकी रूप से कार्यकाल पूरा कर चुका हो, लेकिन वह उसी मिट्टी, उसी परिवेश और उन्हीं लोगों के बीच रहता है। वह ग्रामीणों के सुख-दुख का सहभागी होता है और उसे पता होता है कि गांव की वास्तविक प्राथमिकताएं क्या हैं और उनके प्रति उसका भावनात्मक जुड़ाव बना रहता है।
स्थानीय लोकतांत्रिक व्यवस्था सर्वोपरि
मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि लालफीताशाही की अपनी एक जड़वत प्रवृत्ति होती है, जिसके कारण कई बार विकास कार्य अनावश्यक प्रक्रियाओं और प्रशासनिक उलझनों में फंसकर ठहराव का शिकार हो जाते हैं। योजनाएं बनती हैं, घोषणाएं होती हैं, लेकिन स्थानीय स्तर पर निर्णय लेने की गति धीमी पड़ने से जनता तक उसका अपेक्षित लाभ समय पर नहीं पहुंच पाता। विशेष रूप से गांवों में, जहां विकास की छोटी-छोटी योजनाएं भी लोगों के दैनिक जीवन से गहराई से जुड़ी होती हैं, वहां प्रशासनिक शिथिलता सीधे जनजीवन को प्रभावित करती है। ऐसे समय में योगी सरकार ने पारंपरिक नौकरशाही के इसी जड़ ढांचे को तोड़ते हुए स्थानीय लोकतांत्रिक व्यवस्था को सर्वोपरि रखने का प्रयास किया है। निवर्तमान ग्राम प्रधानों को प्रशासक के रूप में जिम्मेदारी सौंपने का निर्णय केवल एक प्रशासनिक व्यवस्था नहीं, बल्कि यह उस राजनीतिक विश्वास का प्रतीक है जिसमें सरकार जनता और उसके द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों की क्षमता पर भरोसा व्यक्त करती है।
जनता के लिए इस निर्णय के गहरे व्यावहारिक अर्थ हैं। इससे गांवों में विकास कार्यों की निरंतरता बनी रहेगी और योजनाओं के क्रियान्वयन में किसी प्रकार का गतिरोध उत्पन्न नहीं होगा। ग्रामीण समाज में प्रशासनिक रिक्तता कई बार अव्यवस्था और असमंजस की स्थिति पैदा कर देती है, लेकिन इस निर्णय ने उस आशंका को काफी हद तक समाप्त किया है। प्रख्यात चिंतक नानाजी देशमुख का मानना था कि ग्राम विकास केवल सरकारी योजनाओं से नहीं, बल्कि ग्रामीण समाज की सामूहिक इच्छाशक्ति और स्थानीय नेतृत्व की सक्रिय भागीदारी से संभव होता है। उनका विश्वास था कि जब गांव स्वयं अपने विकास का दायित्व उठाते हैं, तभी आत्मनिर्भर और सशक्त भारत का निर्माण संभव हो पाता है। योगी सरकार का यह निर्णय उसी विचारधारा के निकट दिखाई देता है, जिसमें गांव को केवल प्रशासनिक इकाई नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक चेतना और विकास की जीवंत शक्ति के रूप में देखा गया है।
परिपक्व सरकार का प्रारूप
इसी वैचारिक परिप्रेक्ष्य में ग्रामीण निकायों के चुनावों में ओबीसी आरक्षण के निर्धारण हेतु समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग के गठन के निर्णय को भी देखा जाना चाहिए। इसमें कोई संदेह नहीं कि भारतीय समाज की जटिल सामाजिक संरचना को समझे बिना एक न्यायपूर्ण और समावेशी व्यवस्था की कल्पना अधूरी है। हमारे समाज का एक बड़ा वर्ग, जो सदियों से कृषि, शिल्प, कारीगरी और विविध श्रमप्रधान कार्यों से जुड़ा रहा है, उसे सामाजिक और राजनीतिक मुख्यधारा में सम्मानजनक एवं पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिलना लोकतंत्र की मूल आवश्यकता है। आरक्षण केवल राजनीतिक प्रतिनिधित्व का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, समरसता और समावेशी विकास की संवैधानिक प्रतिबद्धता का आधार है। उच्चतम न्यायालय के निर्देशों और संवैधानिक मर्यादाओं को ध्यान में रखते हुए उत्तर प्रदेश सरकार ने इस संवेदनशील प्रश्न पर जिस परिपक्वता और दूरदर्शिता का परिचय दिया है, वह उल्लेखनीय है। उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम, 1947 तथा उत्तर प्रदेश क्षेत्र पंचायत एवं जिला पंचायत अधिनियम, 1961 के अंतर्गत पंचायतों में आरक्षण की व्यवस्था पहले से लागू है। प्रावधान यह सुनिश्चित करते हैं कि पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण कुल पदों के 27 प्रतिशत से अधिक न हो। साथ ही, यदि अद्यतन जनसंख्या संबंधी आंकड़े उपलब्ध न हों, तो वैज्ञानिक सर्वेक्षण के माध्यम से आवश्यक आंकड़े निर्धारित किए जा सकते हैं। ऐसे समय में समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन केवल एक प्रशासनिक निर्णय के साथ-साथ पिछड़े वर्गों के अधिकारों को ठोस कानूनी और संवैधानिक सुरक्षा प्रदान करने की दिशा में उठाया गया एक नैतिक और लोकतांत्रिक कदम है।
लोकतंत्र की जड़ों को सींचती ग्राम पंचायतें
भारतीय लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति संसद और विधानसभाओं से पहले गांवों की चौपालों, पंचायत भवनों और स्थानीय स्वशासन की संस्थाओं में दिखाई देती है। ग्राम पंचायत केवल एक प्रशासनिक इकाई के साथ-साथ लोकतंत्र का वह मूल बीज है, जिससे जनभागीदारी, सामाजिक न्याय और विकास की पूरी संरचना विकसित होती है।। यदि यह बीज कमजोर हो, यदि पंचायतें नौकरशाही की कठपुतलियां बनकर रह जाएं या प्रशासनिक शून्यता में डूब जाएं, तो ऊपर का पूरा ढांचा भले ही भव्य दिखे, भीतर से खोखला होता जाता है। गांव को केवल सरकारी योजनाओं का उपभोक्ता नहीं बनाया जा सकता, उसे योजनाओं का निर्माता और क्रियान्वयनकर्ता बनाना होगा। उत्तर प्रदेश जहां 58 हजार से अधिक ग्राम पंचायते हैं, वहां योगी सरकार के ये दोनों ही निर्णय दूरगामी प्रभाव डालेंगे।
(अस्वीकरण: ये लेखक के निजी विचार हैं। लेखक प्रोफेसर श्रीप्रकाश सिंह हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के कुलपति हैं।)