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विचार: सिर्फ कागज नहीं होता नियुक्ति पत्र

Mon, 01 Jun 2026 08:48 PM IST
Rahul Kumar प्रो. एमके अग्रवाल

सार

उत्तर प्रदेश में मई माह में 2000 से अधिक अभ्यर्थियों को नियुक्ति पत्र वितरित किए जा चुके हैं। हाल ही में कुल 932 चयनित अभ्यर्थियों को नियुक्ति पत्र सौंपे गए। यह दर्शाता है कि भर्ती प्रक्रिया केवल औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि युवाओं को रोजगार देने के लिए सरकार की सतत और योजनाबद्ध प्रतिबद्धता का हिस्सा है।
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फाइल फोटो। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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रोजगार सिर्फ आय का साधन भर नहीं है, यह सामाजिक प्रतिष्ठा का, पारिवारिक सुरक्षा का, और मानवीय गरिमा का प्रश्न भी है। जब कोई सरकार इस यथार्थ को समझकर अपनी नीतियां बनाती है, तो उसके परिणाम केवल सांख्यिकीय नहीं होते, वे सामाजिक रूपांतरण की प्रक्रिया का हिस्सा बन जाते हैं। किसी परिवार में जब पहली बार कोई सदस्य सरकारी सेवा में जाता है, तो वह केवल एक नौकरी नहीं पाता, वह उस परिवार में पीढ़ियों के संचित अभाव और प्रतीक्षा पर विराम लगाता है। वह एक ऐसा क्षण होता है जो पिछली पीढ़ी की दमित आकांक्षाओं को उड़ान देते हुए नई संभावना का द्वार खोलता है। ऐसे घरों में जब एक नियुक्ति पत्र आता है, तो वह केवल कागज नहीं होता, वह समूचे परिवार के त्याग और संघर्ष की सामूहिक जीत होती है।

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मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पिछले दिनों उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग द्वारा 21 विभिन्न विभागों की विविध सेवाओं के लिए चयनित 932 अभ्यर्थियों को नियुक्ति पत्र वितरित किए, किंतु यह संख्या अपने आप में पूरी कहानी नहीं कहती। मई माह का समग्र चित्र और भी व्यापक है। हालिया नियुक्तियों को मिलाकर केवल इसी माह में 2000 से अधिक अभ्यर्थियों को नियुक्ति पत्र सौंपे जा चुके हैं। यह आंकड़ा इस बात का प्रमाण है कि नियुक्ति की यह प्रक्रिया किसी विशेष अवसर की औपचारिकता नहीं, बल्कि एक सुनियोजित और सातत्यपूर्ण शासकीय संकल्प है।  

उत्तर प्रदेश में रोजगार का प्रश्न सदैव से जटिल और बहुआयामी रहा है। एक ओर जनसंख्या का वह विराट दबाव है, जो प्रतिवर्ष लाखों युवाओं को श्रम बाजार में धकेलता है। दूसरी ओर सरकारी तंत्र का वह सीमित सामर्थ्य है, जो सबको सरकारी सेवा में समाहित नहीं कर सकता। इसके बीच योगी सरकार के सामने यह चुनौती थी कि वह रोजगार के ऐसे बहुस्तरीय अवसर सृजित करे जो न केवल संख्या में पर्याप्त हों, बल्कि गुणवत्ता और स्थायित्व में भी सम्मानजनक हों। सरकार ने इस दिशा में जो रणनीति अपनाई है, वह एकांगी नहीं है। वह सरकारी भर्ती, सूक्ष्म एवं लघु उद्योगों के विस्तार और निजी क्षेत्र के सहयोग, इन तीनों स्तंभों पर एक साथ टिकी है। सरकार अब तक 9 लाख से अधिक लोगों को सरकारी नौकरियां दे चुकी है। एमएसएमई क्षेत्र में किए गए विकास एवं सुधारों का परिणाम यह है कि इसमें 3 करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार मिला है। यह संयुक्त उपलब्धि किसी भी राज्य की अर्थव्यवस्था के लिए ऐतिहासिक महत्त्व की है।
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शिक्षा के क्षेत्र की बात करें तो परिषदीय विद्यालयों के 11508 रिक्त पदों पर शीघ्र भर्ती के साथ उच्च प्राथमिक विद्यालयों में 10000 अनुदेशकों की भर्ती की भी तैयारी है। प्राथमिक और उच्च प्राथमिक दोनों स्तरों पर एक साथ मानव-संसाधन की पूर्ति करने का यह निर्णय केवल प्रशासनिक आवश्यकता नहीं है, यह एक सोची-समझी शैक्षणिक दृष्टि का परिचायक है। जिस राज्य में बच्चे अच्छे शिक्षकों से पढ़ेंगे, उस राज्य को कल के रोजगार बाजार के लिए बेहतर युवा मिलेंगे। शिक्षा और रोजगार का यह चक्र परस्पर-पोषक है। एक को मजबूत करना दूसरे को भी सुदृढ़ करता है। एक शिक्षक या अनुदेशक का पद भरना केवल एक व्यक्ति को रोजगार देना नहीं है, वह दशकों तक सैकड़ों बच्चों के भविष्य को आकार देने की क्षमता का निवेश है। 

तथापि, किसी भी नीति का निष्पक्ष मूल्यांकन करते समय उन चुनौतियों से आंखें नहीं मूंदी जा सकतीं जो इस उज्ज्वल तस्वीर के हाशिये पर अब भी विद्यमान हैं। सरकारी भर्तियों में विज्ञापन से नियुक्ति तक की प्रक्रिया के कालखंड को न्यूनतम करना शासन की प्राथमिकता होनी चाहिए। निजी और एमएसएमई क्षेत्र में श्रम कानूनों का कड़ाई से अनुपालन और सामाजिक सुरक्षा का विस्तार इस दिशा में अनिवार्य हस्तक्षेप है। इन चुनौतियों को स्वीकार करना कमजोरी नहीं, परिपक्वता का लक्षण है। जो समाज और जो शासन अपनी सीमाओं को पहचानता है, वही उन्हें पार कर सकता है। रोजगार की राह में जितने भी अवरोध हैं, चाहे वे प्रक्रियागत हों, संरचनागत हों, या कौशल में कमी के, उनका समाधान संभव है। और उत्तर प्रदेश में आज यह हो रहा है तो सिर्फ इसलिए कि नीति की दृष्टि स्पष्ट है और क्रियान्वयन की इच्छाशक्ति अटल।
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(अस्वीकरण: ये लेखक के निजी विचार हैं। लेखक प्रो. एम.के. अग्रवाल लखनऊ विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र विभाग में कार्यरत हैं।)

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