श्रद्धा, आस्था और सुरक्षा से जुड़े अयोध्या चढ़ावा चोरी प्रकरण के बेहद संवेदनशील मुद्दे पर जहां एक तरफ जांच एजेंसियां अपना काम कर रही हैं, वहीं दूसरी तरफ कुछ ऐसे चेहरे भी सक्रिय हो गए हैं, जो लंबे समय से मुख्यधारा की राजनीति से दूर थे। ऐसा प्रतीत होता है कि इन नेताओं के लिए यह प्रकरण खुद को दोबारा प्रासंगिक बनाने का एक सुनहरा अवसर लग रहा है।
'कमबैक' की छटपटाहट
राजनीति का एक क्रूर नियम है, 'जो दिखता है, वो बिकता है।' जो नेता पिछले कई चुनावों से जनता द्वारा नकारे जा चुके हैं या अपनी ही पार्टियों में दरकिनार कर दिए गए हैं, उनके लिए अयोध्या जैसा नाम एक बहुत बड़ा 'लाउडस्पीकर' है। टीवी डिबेट्स में जगह पाने और सोशल मीडिया पर ट्रेंड करने के लिए ऐसे नेता इस प्रकरण पर तीखे और विवादास्पद बयान दे रहे हैं। जनता की भावनाओं को भड़का कर ये नेता अपनी खोई हुई साख को वापस पाने की छटपटाहट में हैं।
वास्तविक चिंता या सिर्फ फोटो-ऑपर्च्यूनिटी?
यह सर्वविदित है कि जब कोई ऐसा मुद्दा उठता है, तो जमीन पर काम करने वाले संगठन और वर्तमान जनप्रतिनिधि उस पर कानूनी और प्रशासनिक कार्रवाई की मांग करते हैं, जो हो भी रही है। योगी सरकार द्वारा गठित एसआईटी प्रकरण की जांच कर रही है। कई आरोपी जेल भेजे जा चुके हैं और मामला सुप्रीम कोर्ट में भी पहुंचा है। लेकिन, ऐसे मौकों पर अलग-थलग पड़े नेताओं का तरीका थोड़ा अलग होता है। इनका ध्यान समाधान खोजने से ज़्यादा धरना-प्रदर्शन की तस्वीरों, प्रेस कॉन्फ्रेंस और सोशल मीडिया प्लेटफार्म्स पर बयानों की धुंआधार बौछार करने पर होता है।
अब 'स्मार्ट' हो चुकी है जनता
आज का वोटर बेहद जागरूक है। वह भली-भांति जानता है कि जो नेता जनता के सुख-दुख के समय दिखाई नहीं देते, राष्ट्रवाद को चोट पहुंचाने वाले गंभीर मुद्दों पर चुप्पी साध लेते हैं, वे अचानक किसी विवाद के आते ही कैमरों के सामने क्यों प्रकट हो जाते हैं। चढ़ावा चोरी प्रकरण निश्चित रूप से कानून के दायरे में एक अपराध है और इसके लिए दोषियों को सख्त सजा मिलनी चाहिए।
बहुसंख्य जनता के लिए अप्रासंगिक हो चुके कुछ नेताओं के लिए अयोध्या का यह प्रकरण 'सियासी संजीवनी' की तरह दिखाई जरूर दे सकता है, लेकिन रेत पर महल बनाने वाले कभी टिकाऊ राजनीति नहीं कर पाते। यह देखना दिलचस्प होगा कि इस मुद्दे पर अपनी जमीन तलाश रहे इन नेताओं को भविष्य की कोख से क्या नसीब होता है।
(अस्वीकरण: ये लेखक के निजी विचार हैं। लेखक आलोक चंद्रा भारतीय प्रबंध संस्थान, कोलकाता के पूर्व मुख्य प्रशासनिक अधिकारी हैं।)