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वेटिंग है रिव्यू: तत्काल टिकट की कालाबाजारी पर दिलचस्प कहानी, दिव्येंदु ने संभाला मोर्चा; कहां पड़ी कमजोर?

सार

Waiting Hai Web Series Review In Hindi: फिल्मों और सीरीज में अपराध की दुनिया अक्सर ड्रग्स, हत्या, गैंगस्टर और पुलिस के इर्द-गिर्द घूमती है। ‘वेटिंग है’ ने अपराध के लिए ऐसी चीज चुनी है, जिससे आम आदमी रोज जूझता है। रेलवे टिकट... खासकर तत्काल टिकट। पढ़ें कैसी है यह वेब सीरीज?
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वेबसीरीज 'वेटिंग है' रिव्यू - फोटो : अमर उजाला
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Movie Review
वेटिंग है
कलाकार
दिव्येंदु शर्मा , भुवन अरोड़ा , कुमुद मिश्रा , विजय मौर्य , हर्षिता गौर , सुनीता राजवार , दयाशंकर पांडे और यशपाल शर्मा
लेखक
श्रेयस जैन , प्रतीक पायोधी और आशीष थॉमस
निर्देशक
समीर विद्वांस
निर्माता
अजय राय , सना वारसी और ज्योति देशपांडे
रिलीज डेट
16 सितंबर 2026
रेटिंग
3/5

विस्तार
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फिल्मों और सीरीज में अपराध की दुनिया अक्सर ड्रग्स, हत्या, गैंगस्टर और पुलिस के इर्द-गिर्द घूमती है। ‘वेटिंग है’ ने अपराध के लिए ऐसी चीज चुनी है, जिससे आम आदमी रोज जूझता है। रेलवे टिकट... खासकर तत्काल टिकट।
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सात एपिसोड की यह सीरीज एक नए आरपीएफ कांस्टेबल और रेलवे टिकटिंग सिस्टम की कमियों का फायदा उठाने वाले युवा की कहानी है। आइडिया दिलचस्प है और शुरुआत में पकड़ भी बनती है। लेकिन आगे बढ़ते हुए कहानी की कसावट कम होती जाती है।

वेटिंग है - फोटो : इंस्टाग्राम@mxbyprimevideo
कहानी
कहानी शुरू होती है सुगम मिश्रा (दिव्येंदु शर्मा) से। सुगम नया-नया आरपीएफ (रेलवे प्रोटेक्शन फाॅर्स)  कांस्टेबल बना है और पत्नी प्रिंसी के साथ पटना पहुंचता है। नौकरी के पहले दिन से ही उसे सीनियर के ताने सुनने पड़ते हैं। उसे यह भी सुनना पड़ता है कि नौकरी उसे उसके शहीद पिता की वजह से मिली है।

दूसरी तरफ अफरोज हमजा (भुवन अरोड़ा) है। कंप्यूटर की अच्छी जानकारी रखने वाला हमजा पैसों की कमी से जूझ रहा है। पसंद की लड़की को प्रभावित करने के लिए वह रेलवे की वेबसाइट में सेंध लगाकर उसके लिए कन्फर्म टिकट निकालता है। यहीं से उसकी जिंदगी की दिशा बदलती है।

हमजा समझ जाता है कि इस तकनीक से पैसा कमाया जा सकता है। उसका मामा (विजय मौर्या) इसमें उसका साथ देता है। देखते ही देखते छोटा-सा जुगाड़ बड़े टिकट रैकेट में बदल जाता है। उधर सुगम को शक होता है कि आम यात्रियों को तत्काल टिकट नहीं मिलते...लेकिन एजेंट लगातार कन्फर्म टिकट निकाल लेते हैं। वह इस खेल की तह तक जाने लगता है।  इस दौरान हमजा और मामा की टक्कर टिकट रैकेट के बड़े खिलाड़ी भूरा (यशपाल शर्मा) से भी होती है। भूरा ज्यादा हिस्सा हड़प रहा होता है.... जिसके बाद दोनों उसके खिलाफ मोर्चा खोलते हैं।

इसके बाद कहानी दो पैरेलल  ट्रैक पर चलती है। सुगम रैकेट को पकड़ने की कोशिश करता है और हमजा उसे लगातार बड़ा करता जाता है। दोनों किरदार एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हैं। यही बात सीरीज को दिलचस्प बनाती है।  एक सिस्टम के भीतर रहकर अपना रास्ता बनाने की कोशिश कर रहा है। दूसरा उसी सिस्टम की कमजोरी को कमाई का जरिया बना रहा है। दिक्कत बीच के हिस्से में आती है। कुछ हिस्से कहानी से भटकाते हैं। इससे टिकट रैकेट वाली कहानी का तनाव कमजोर पड़ता है।

वेटिंग है - फोटो : इंस्टाग्राम@mxbyprimevideo
अभिनय
दिव्येंदु शर्मा: ‘मिर्जापुर’ के मुन्ना त्रिपाठी की आक्रामकता और ‘मडगांव एक्सप्रेस’ की कॉमिक टाइमिंग के बाद यहां दिव्येंदु बिल्कुल अलग अंदाज में नजर आते हैं। सुगम शांत है, लेकिन खुद को साबित करने की बेचैनी उसके भीतर बनी रहती है। नौकरी की झुंझलाहट और जांच का दबाव दिव्येंदु ने बिना ओवरडू किए निभाया है। कई जगह उनके एक्सप्रेशन और बॉडी लैंग्वेज संवादों से ज्यादा असर छोड़ते हैं।

भुवन अरोड़ा: ‘फर्जी’ में शाहिद कपूर के दोस्त फिरोज के किरदार से पहचान बनाने वाले भुवन अरोड़ा ने इसके बाद ‘चंदू चैंपियन’ और ‘अमरन’ में भी अलग तरह के किरदार निभाए। ‘वेटिंग है’ में उन्हें कहानी का एक बड़ा हिस्सा संभालने का मौका मिला है। मासूमियत से शुरू होकर चालाकी और आत्मविश्वास की तरफ बढ़ते हमजा को भुवन ने बारीकी से पकड़ा है। खासकर बाद के एपिसोड में उनके हाव-भाव में आया बदलाव अच्छा लगता है।

सपोर्टिंग कास्ट: विजय मौर्य मामा के किरदार में अपनी छाप छोड़ते हैं। हर्षिता गौर को प्रिंसी के रूप में अपनी पहचान बनाने की जगह मिली है। यशपाल शर्मा, कुमुद मिश्रा और सुनीता राजवार जैसे कलाकार छोटे हिस्सों में भी असर छोड़ते हैं।

- फोटो : इंस्टाग्राम@mxbyprimevideo
निर्देशन 
समीर विद्वांस के पुराने कामों को देखें तो ‘वेटिंग है’ उनके लिए बिल्कुल अलग कहानी है। मराठी प्रोजेक्ट्स - ‘आनंदी गोपाल’ में सामाजिक और ऐतिहासिक कहानी थी, वहीं ‘धुराला’ में राजनीति और रिश्ते थे। कार्तिक आर्यन-कियारा आडवाणी स्टार्रर ‘सत्यप्रेम की कथा’ में रिश्तों के साथ संवेदनशील मुद्दा था।

यहां उन्होंने रेलवे और पटना को कहानी का हिस्सा बनाया है। स्टेशन, छोटे शहर का माहौल, पुलिस व्यवस्था और टिकट के लिए भागदौड़ सीरीज को जमीन से जोड़ते हैं। सुगम और हमजा के ट्रैक को अलग-अलग शुरू करना भी काम करता है। दर्शक जानते हैं कि दोनों की मंजिल एक है, लेकिन रास्ते अलग हैं। उनके ट्रैक करीब आते हैं तो कहानी में दिलचस्पी बढ़ती है।

लेकिन टोन हमेशा एक जैसा नहीं रहता। गंभीर घटनाओं के बीच अचानक हल्का हास्य आ जाता है। जैसे, सुगम की VIP ड्यूटी के दौरान पुलिस के कुत्ते का भाग जाना या उसका हनीमून वाला हिस्सा। ऐसे सीन कुछ देर के लिए मुख्य कहानी से दूर ले जाते हैं। मामा का शराब और देह व्यापार करने वाली महिलाओं पर पैसे खर्च करना भी टिकट रैकेट की कहानी से ध्यान हटाता है।

वेटिंग है - फोटो : इंस्टाग्राम@mxbyprimevideo
स्क्रीनप्ले और लेखन
तत्काल टिकट के खेल को क्राइम कहानी बनाना सीरीज का सबसे मजबूत हिस्सा है। सुगम का इस खेल पर शक करना और हमजा का एक टिकट से इसे धंधा बना लेना सहज तरीके से लिखा गया है। 
लेकिन बीच में स्क्रीनप्ले की रफ्तार धीमी पड़ती है। कुछ सीन कहानी को आगे बढ़ाने के बजाय सिर्फ माहौल बनाने तक सीमित रह जाते हैं।

लेखन में छोटे शहर की भाषा और हल्का हास्य कहानी को सहज बनाते हैं। लेकिन कई जगह यही हास्य जरूरत से ज्यादा खिंच जाता है। मामा से जुड़े कुछ सीन इसका उदाहरण हैं...इससे क्राइम कहानी का तनाव कम होता है।
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वेटिंग है - फोटो : इंस्टाग्राम@mxbyprimevideo
देखें या नहीं?
‘वेटिंग है’ का आइडिया इसकी सबसे बड़ी ताकत है। आम आदमी की तत्काल टिकट वाली परेशानी को अपराध की कहानी बनाना अलग कोशिश है। दिव्येंदु शर्मा और भुवन अरोड़ा भी अपने किरदारों को अच्छी तरह संभालते हैं। लेकिन दिलचस्प आइडिया के बावजूद सीरीज हर एपिसोड में उतनी पकड़ नहीं बना पाती। बीच के हिस्से में कहानी भटकती है और टोन भी कई बार बदलता है।

छोटे शहर की पृष्ठभूमि वाली हल्की-फुल्की क्राइम ड्रामा पसंद है तो ‘वेटिंग है’ देखी जा सकती है। लेकिन तत्काल टिकट के इस दिलचस्प खेल से जिस रोमांच की उम्मीद बनती है, सीरीज उसे अंत तक पूरी तरह कायम नहीं रख पाती।
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