‘मिथ्या’ और ‘बेस्टसेलर’ दोनों एक जैसी श्रेणियों की वेबसीरीज हैं। ‘मिथ्या’ से वैसे भी खास उम्मीद नहीं थी लेकिन ‘बेस्टसेलर’ का प्रचार अपने जमाने के मेगास्टार रहे मिथुन चक्रवर्ती के ओटीटी डेब्यू के तौर पर किया गया तो इसकी गहराइयां नापने का मन जरूर किया। उम्मीद ये भी रही कि दीपिका पादुकोण के अभिनय और कहानियों की उनकी नई पसंद की ‘गहराइयां’ दिखाने के बाद प्राइम वीडियो इस बार कुछ ऐसा परोसेगा कि वीकएंड पर इस ओटीटी को दिए समय पर कोफ्त नहीं होगी। लेकिन नतीजा फिर वही ढाक के तीन पात। कसूर यहां भी कहानी का है। सीरीज की कहानी रवि सुब्रमण्यम के उपन्यास ‘द बेस्टसेलर शी रोट’ से ली गई है। उपन्यास जैसा रोमांच लेकिन सीरीज में है नहीं। ये एक सतही सपाट और बेहद खराब तरीके से बनाई गई वेब सीरीज है, जिसमें यूं लगता है कि समीर आर्या ने बस कैमरा ऑन करके छोड़ दिया और जिस कलाकार को जो मन में आया करके चला गया।
कहानी शुरू होती है एक उपन्यास से। नाम है, रांड सांड सीढ़ी संन्यासी। कहानी में काशी तो है पर वाराणसी का नाम राजसी कर दिया गया है। वैसे ही जैसे ‘ये काली काली आंखें’ में यूपी को ओंकारा बना दिया गया। मनोरंजन का ये मिथ्या काल है। कल्पना करने में भी यहां लोगों को डर लगता है और आइडिया मार लेने में यहां किसी को अपराधबोध नहीं होता है। लेखक है। कहानी मिली। लिख दी। बिना ये सोचे कि मामला उल्टा भी पड़ सकता है। ये लेखक है ताहिर वजीर। किसी कोने से इसके लक्षण राइटर जैसे नहीं हैं। घमंडी है। बदतमीज है। खुद में ही खोया हुआ है। पता नहीं एक कामयाब बीवी कैसे झेलती रही इसे। कहानी में ट्विस्ट एक अनजान लड़की के आने से होता है। और, साथ ही कहानी में आता है सोशल मीडिया का एक ट्रोल जिसके निशाने पर ताहिर वजीर है। चौथे एपीसोड तक आते आते जब दर्शक पकने लगता है तो सारा किस्सा ही सामने आ जाता है। उसके ठीक पहले वाले एपीसोड में आए एसीपी प्रामाणिक को भले बार बार इंस्पेक्टर कहकर बुलाया जा रहा हो लेकिन इस किरदार की कोशिशें भी आगे बेकार होती जाती हैं।
वेब सीरीज ‘बेस्टसेलर’ एक ऐसी हिंदी वेब सीरीज है जिसे पूरा देख लेने वालों का अमेजन प्राइम वीडियो को कम से कम साल भर का सब्सक्रिप्शन माफ कर देना चाहिए। और जिन लोगों ने उनकी फिल्म ‘गहराइयां’ पूरी देखने के बाद ये सीरीज पूरी देखी है, उनको तो अलग से कुछ पारितोषिक और भी मिलना चाहिए। हिंदी सिनेमा का गर्त काल पहले से शुरू है। ओटीटी वेब सीरीज में भी ये मिथ्या काल चल पड़ा तो दर्शकों के सामने मार्वल सीरीज देखने का ही रास्ता बचेगा। मुकुल अभयंकर को सोचना भी चाहिए कि आखिर इतनी चलताऊ सीरीज बनाने से बतौर एक क्रिएटिव पेशेवर उन्हें क्या मिला?
मिथुन चक्रवर्ती ही इस सीरीज को देखने की एक बड़ी वजह थे, लेकिन सीरीज के लेखकों ने उनके किरदार का भी कचमूर निकालकर रख दिया। बाथरूम में लगे कैमरे में देखकर ट्रोल को चुनौती देने वाले सीन में मिथुन का रुआब दिखता है। दिखता है कि उनकी उम्र और शख्सीयत के हिसाब से किरदार लिखें जाएं तो इस पुराने चावल में अब भी बहुत महक बाकी है। श्रुति हसन के बस का नहीं है एक उत्तर भारतीय किरदार करना। वह भी ऐसा जिसके अतीत के पेंच इतने घुमावदार हों। हिंदी वह ठीक से बोल पाती नहीं हैं और चेहरे पर उनके भाव उधार के लगते हैं। अर्जन बाजवा और सत्यजीत दुबे भी खास मदद सीरीज की करते नहीं हैं। सोनाली कुलकर्णी को उनके कमजोर किरदार ने मात दे दी। सीरीज में ढंग का काम गौहर खान के हिस्से आया लेकिन उनके आसपास इतना रायता फैला है कि उनकी अदाकारी भी इसे रोशन नहीं कर सकी।