साहित्य और सिनेमा को करीब लाने की बात
बातचीत में मणिरत्नम कहते हैं, 'मैं अभी भी दर्शकों के बीच बैठा एक आम इंसान हूं। कई मायनों में मैं अभी भी एक नौसिखिया जैसा महसूस करता हूं। इसके अलावा मेरा मानना है कि सिनेमा और साहित्य के बीच का ग्राफ जितना करीब होगा, भारतीय सिनेमा उतना ही बेहतर होगा।' साथ ही मणिरत्नम में इस बात पर भी जोर दिया कि फिल्म निर्माताओं को लिखे हुए शब्दों को आकर्षक दृश्य और कहानियों में बदलने की कला को निखारना चाहिए।
कल्पनाशील बनने पर जोर दिया
मणिरत्नम साहित्य को फिल्मों में ढालने की बारीकियों पर चर्चा करते हुए आगे कहते हैं, 'फिल्में एक दृश्य माध्यम हैं, जबकि किताबें मुख्य रूप से कल्पनाशील होती हैं। एक फिल्म निर्माता को पाठक की कल्पना को जीवंत करने में अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए।' मणिरत्नम ने यह भी कहा कि स्क्रिप्ट में समायोजन की जरूरत हो सकती है, लेकिन इन बदलावों से कहानी का सार बदलने के बजाय कहानी को बेहतर बनना चाहिए।
पोन्नियन सेल्वम पोस्टर- मणिरत्नम
- फोटो : इंस्टाग्राम-@ponniyinselvan_movie/ani
प्राचीन भारतीय इतिहास से रहे प्रभावित
मणिरत्नम ने इसी बातचीत में यह भी बताया कि वह पौराणिक कथाओं और प्राचीन भारतीय इतिहास से प्रभावित हैं। इन चीजों ने उनके दृष्टिकोण को बहुत प्रभावित किया है। ऐसा होने पर उन्हें अपनी फिल्म के पात्रों को अनोखे तरीके से दिखाने में कामयाबी मिली। मणिरत्नम की फिल्म 'पोन्नियिन सेल्वन' उनका ऐसा ही एक बेहतरीन प्रयास रहा। इस फिल्म में वह चोल राजवंश की कहानी को शानदार तरीके से दिखाने में कामयाब रहे।